अ.भा.औदीच्य महासभा की स्थापना से अब तक निम्नानुसार अधिवेशन आदि

महासभा की स्थापना से अब तक निम्नानुसार अधिवेशन और समाज कार्य सम्पन्न हुए।

इसका प्रथम अधिवेशन 1904– संवत 1960 के फाल्गुन शुक्ल 3, 4, 5, ता;19,20,21 अप्रेल सन 1904 में अ;भा; औदीच्य् महासभा का प्रथम अधिवेशन औदीच्य ब्रहम समाज के छठे अधिवेशन के साथ मथुरा में सम्पन्न हुआ। जिसमें विभिन्न स्थानों से 110 प्रतिनिधि उपस्थित हुए थे|

 व्दितीय अधिवेशन 1925 – मई 1925 में ग्वा्लियर में महासभा का अधिवेशन बुलाया गया था । इस अधिवेशन में मातृभाषा, संस्कारों के रक्षण के साथ ही बाल विवाह निषेघ, विधवाश्रम, विध्यालय खोलने जैसे विषयों पर प्रस्ताव् स्वीक्रत हुऐ।

 तृतीय अधिवेशन 1927- आषाढ शुक्लपक्ष संवत 1984 जून सन 1927 में रायबहादुर चंपालाल जी त्रिपाठी के सभापतित्व‍ में महासभा का अधिवेशन काशी बनारस में सम्पीन्न हुआ । इसमें भी छोटी बडी समवाय के संबंध में चर्चा होकर आचार शुध्दि पर विशेष जोर दिया गया।

 चतुर्थ अधिवेशन 1928 – वेशाख माह संवत 1985 सन 1928 में रं. रघुनाथ जी महोदय के सभापतित्व् में माधोपुर में सम्पन्न हुआ । मालवा तथा 84 परगने से पहली बार प्रतिनिधि इस अधिवेशन में उपस्थित हुए थे। इसमें औदीच्य ब्राहमणों का अधिक्रत इतिहास बनाने तथा जयपुर में औदीच्य छात्रावास बनाने तथा बागड एवं मालवा प्रान्त में प्रचार करने संबंधी प्रस्तावों पर बल दिया गया।

 पंचम अधिवेशन 1930– सन 1930 में मथुरा में ही सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन में मालवा तथा 84 परगना से बहुत बडी संख्या में प्रतिनिधि आये थे। इसमें महासभा के सदस्यों की वृध्दि, मितव्ययता [खर्च कम करने] एवं कुरीतियां हटाने आदि विषयों पर प्रस्ता व स्वीृकृत हुए। मार्च 1930 में महासभा के प्रस्तावों एवं उददेश्यों के प्रचार प्रसार के लिये एक समिति का गठन कोटा की महासभा की व्यवस्थांपिका की बैठक में किया गया। सन 1925 से 1933 तक पंडित लक्ष्मीधर जी त्रिपाठी ने महासभा के प्रधानमंत्री के रूप में बडी कुशलता से कार्य संपादित किया।

 षष्ठम अधिवेशन1935– दिनांक 19,20,21,22 अप्रेल सन 1935 में पवित्र तीर्थ नगरी पुष्कर में- महासभा का छठा अधिवेशन सम्पंन्न हुआ। मनोनित सभापति श्री कन्हैसयालाल जी उपाध्या्य वकील थे। इस आयोजन में श्री शंकराचार्य जी महाराज श्री त्रिविक्रमतीर्थ जी विशेष रूप से पधारे थे। इस अधिवेशन में विभिन्नं विषयों एवं सामयिक समस्याओं पर 8 से अधिक प्रस्तााव सर्वसम्मति से स्वीकृत किये गये । इस अधिवेशन में महासभा की कार्यवाही को हिन्दी में ही प्रकाशित करने एवं औदीच्यि बन्धु पत्रिका की आर्थिक स्थिति सुद्रढ करने , संध्योंपासना, यथाशक्ति परोपकार, समाज सेवा, कन्या एवं पुत्रों को सुशिक्षित करना , 18 वर्ष की आयु के पूर्व पुत्र का विवाह नहीं करना, म्रत्यु भोज शास्त्रानुसार एवं यथाशक्ति हो , श्री राधेश्याम जी व्दिवेदी व्दारा रखेंगये ये प्रस्तािव सर्वसम्मंति से स्वी्कृत हुवे ।

 सप्तम अधिवेशन 1936- 1 जून 1936 को औदीच्य् महासभा का सप्तंम अधिवेशन काशी में सम्पन्न हुआ। मनोनीत सभापति श्री गोरीशंकर जी शास्त्री थे। औदीच्यि भवन की स्थापना तथा भगवान गोविन्द माधव का मंदिर बनाने हेतु प्रबंधकारिणी समिति का गठन किया गया । महासभा एवं औदीच्यग बन्धु के सदस्य बढाने हेतु मंडल का गठन किया गया ।

 अष्टम अधिवेशन  8 वा अधिवेशन पं.गोविन्दुवल्लकभ जी शास्त्री् की अध्याक्षता में मथुरा में सम्प.न्न‍ हुआ।

 नवम अधिवेशन 1941 24,25,26 मई सन 1941 को भूसावल में पू. श्रीलालजी पण्ड.या के सभापतित्वआ में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर अ.भा.युवक सम्मे्लन का भी आयोजन किया गया था। अधिवेशन में अर्न्त -प्रांतीय भेदभाव समाप्तअ करने , महासभा को अधिक कार्यक्षम, व्यारपक, गतिशील बनाने तथा सभी नगरों में महासभा की शाखायें स्था पित करने संबंधी प्रस्ता व पारित किए गयें । ब्रहम समाज अपनी सीमित मर्यादा और भाषा भेद के कारण अपना कार्यक्षेत्र नहीं बढा सका ।

 दशम अधिवेशन 1948 – महासभा का दसवा अधिवेशन डा.नारायण दुलीचंद व्याास की अध्य क्षता में जयपुर में सम्पीन्न हुआ। इसमें ” सहस्त्रोदीच्या महासभा ” को सन 1948 में ”अखिल भारतीय औदीच्यु महासभा का स्वरूप प्रदान किया गया क्योंकि महासभा के तब तक के आठ दस अधिवेशनों में उपरोक्त सभी प्रान्तोंस के बंधु भाग लेने आये थे।

 एकादश अधिवेशन 1951– सन 1951 में बडनगर के एकादश अधिवेशन का आयोजन पं. राधेश्या.म जी व्दिवेदी की अध्याक्षता में सम्पन्न कराया गया।इस अधिवेशन में सभी प्रांतों के जाति बन्धुक लगभग 1500 से अधिक संख्यास में उपस्थित हुए और यहीं से इसे अखिल भारतीय स्व्रूरूप प्राप्ते हुआ।इसमें ब्रहम समाज के प्रतिनिधि भी उपस्थित हुए थे। इसमें गायत्री पुरश्चारण महायज्ञ एवं 40 औदीच्य बच्चों का सामूहिक यज्ञोपवित भी महासभा की ओर से कराया गया था। इस अवसर पर औदीच्य छात्रावास का मुहुर्त भी जाति के ही एक भवन में कराया गया था। बडनगर का अधिवेशन सभी प्रकार से सफल रहा था। सक्षम समिति का संगठन करके कानपुर निवासी श्री तुलजाशंकर जी दवे को प्रधानमंत्री बनाया गया ।

 व्दादश अधिवेशन 1955– सन 1955 में महासभा का बारहवा अधिवेशन देवास में सम्पचन्न‍ हुआ। देवास सम्मेगलन की विशेषता यह थी कि उसका उदघाटन राजकोट सौराष्ट्र निवासी तथा इन्दौसर में बसे हुए प्रसिध्द कन्ट्रा क्टर स्वा; श्री त्रिभुवनदास जी व्दा्रा कराया गया । इस सम्मेौलन में गायत्री यज्ञ एवं 12 औदीच्यट बालकों का यज्ञोपवित संस्काशर तथा महिला सम्मे्लन आदि भी सम्प्न्नं हुए।

 तृयोदश अधिवेशन 1957 – महासभा का तेरहवां अधिवेशन इन्दौर में ज्‍येष्ठत क्रष्ण‍ 2,3,4, सवंत 2014 को इन्दौपर के प्रसिध्दु गुजराती समाज के भवन में सफलता पूर्वक सम्पीन्न‍ हुआ। इस सम्मेृलन के अन्त‍र्गत युवक सम्मे‍लन, महिलासम्मेसलन ,प्रदर्शनी, मनोरंजक संवाद ,निबन्ध् योजनाएं आदि कराये गये। इस अधिवेशन के सभापति थे श्री तुलजाशंकर जी दवे। इस अधिवेशन में गुजरात, सौराष्ट।, मालवा, नीमाड राजस्थाेर उत्तपरप्रदेश, पंजाब मध्य प्रदेश, बिहार बंगाल आदि प्रांतों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसमें 29 बटूकों का यज्ञोपवित संस्कार भी हुआ । तीन दिन तक चले इस अधिवेशन को काफी सराहा गया। इस भव्यम सम्मे‍लन में प्रसिध्द ज्ञाति प्रेमी वयोव्रध्द श्री पं. मुकुन्दतरामजी त्रिवेदी जी ने इन्दौर नगर में औदीच्या विध्यार्थी भवन स्थािपित करने के लिए 21000/ रू; दान किये । साथ ही पूर्व निश्चित संकल्पर के अनुसार प्राप्त होने वाली भूमि मूल्य भी देने की घोषणा की । उसी समय लगभग रू; 11 हजार की सहायता के वचन भी मिले। महासभा के इतिहास में यह सफलतम अधिवेशन था। मालवा प्रान्त में हुए सम्मेललनों की सफलता के कारण अन्तमर्प्रान्तीय विवाहों का श्री गणेश होकर इन्दौर में 20 हजार वर्गफीट की जमीन का प्लाट रूपये 17 हजार में लिया उसमें 12 कोठरियां बनी होने से आवश्यीक दुरूस्त करवा कर जुलाई 1958 से छात्रावास प्रारम्भर कर दिया ।

चतुर्दशाधिवेशन 1963 – महासभा का 14 वां अधिवेशन दिनांक 8,9 जून 1963 को श्री मुकुन्दरामजी त्रिवेदी के सभापतित्व में बडनगर में सम्पन्ने हुआ। इसमें 18 बच्चों का यज्ञोपवित संस्कार होकर विभिन्न सामाजिक समस्याओं एवं कुरीतियों के उन्मूलन के साथ महासभा के विस्तार आदि पर प्रस्तात पारित किए गये । इसमें बडी संख्या में प्रतिनिधि गण उपस्थित हुऐ ।

 पंचदशाधिवेशन 1967– अ.भा.औदीच्य महासभा का 15 वा अधिवेशन दिनांक 9,10,11 जून 1967 को औदीच्य धर्मशाला उज्जैन में सम्पन्न् हुआ। इसमें 33 बटूकों का यज्ञोपवित संस्काजर गायत्री हवन महिला सम्मेलन आदि सम्पदन्न हुए। इस अधिवेशन में मुकुन्दिराम छात्रावास इन्दौर का न्यास बनाया गया ।

 सोलहवां अधिवेशन 1970- महासभा का 16 वा अधिवेशन दिनांक 13,14,15 जून 1970 को रतलाम में सम्पधन्न1 हुआ। इसमें श्री देवीशंकर जी तिवाडी अध्यिक्ष चुने गये। इसमें जो प्रस्ताव पास हुवे—-
1–औदीच्य बन्धु के लिये स्थाेयी कोष की स्थापना की जाय । 2–सविधान की धारा 10 के अनुसार प्रत्येुक नगर एवं प्रान्त में महासभा की शाखायें खोली जावे । 3–प्रतिवर्ष हर राज्यप में सामूहिक यज्ञोपवित के कार्यक्रम हो । 4–प्रत्ये क राज्य में ज्ञाति की गणना और सर्वेक्षण कार्य हो ।

 सप्तंदश अधिवेशन 1972 महासभा का 17 वा अधिवेशन दिनांक 21,22 अक्टूवम्‍बर 1972 को कोटा के बडे देवता श्री श्रीधरलाल जी शुक्ल की अध्यक्षता में जयपुर में सम्पयन्नो हुआ। इसमें विधान में आवश्युक संशोधन एवं समस्तय औदीच्य जाति की एकता तथा आर्थिक उन्ननति हेतु व्यांवहारिक आधारो पर जोर दिया गया। इसमें हरियाणा, पंजाब, अहमदाबाद, कलकत्‍ता सौराष्टह आदि प्रान्तोंा के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

 अठारहवा अधिवेशन 1982 अ;भा; औदीच्य महासभा का 18 वा अधिवेशन दिनांक 27,28,29 मई 1982 को उदयपुर में गायत्री यज्ञ एवचं सामूहिक यज्ञोपवित के कार्यक्रम के साथ भव्य एवं अभूतपूर्व रूप से सम्पन्न हुआ। श्री विष्णुेदत्त जी व्यास सम्मेलन के अध्याक्ष थे। इसमें महिला एवं युवा सम्मेलन भी सम्पनन्न हुए। तथा 11 प्रस्ताव पारित किए गए।

 उन्नीसवां अधिवेशन 2005 – अ;भा;औदीच्य महासभा का 19 वा अधिवेश महासभा के गौरवशाली 100 वर्ष पूर्ण होने पर शताब्दी समारोह के रूप में श्री रामचन्द्र जी पाण्डे की अध्यक्षता में 4,5 जून 2005 को उज्जैन में सम्पनन्न हुआ । इसमें महिला युवा सम्मेलान के साथ ही कई महत्व पूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए।

      वर्ष 2009 से अखिल भारतीय औदीच्य महासभा के अध्यक्ष पद पर श्री रघुनन्दन जी शर्मा के सर्व सम्मति से निर्वाचित होने के पश्चात महासभा जैसे सोते से जग उठी नए नए परिवर्तन विकेन्द्रीकरण के अंतर्गत प्रादेशिक और जिला इकाइयों का गठन, महिला एवं युवा प्रदेश और जिला इकाइयो का गठन, अभूतपूर्व सदस्यता अभियान, कई साधारण ओर विशेष सभाओं का केंद्र, प्रादेशिक और जिला स्तर पर आयोजन कई एतिहासिक निर्णय, गुजरात के औदीच्य बंधुओं को जोडेने का कार्य, समाज से संबन्धित पुस्तक श्रीस्थल प्रकाश” का हिन्दी अनुवाद प्रकाशन, आदि , 2013 के अंत तक सम्पन्न हुए। वर्ष 2014 के प्रारम्भ में बहू प्रतिक्षित अखिल भारतीय औदीच्य महासभा का लंबित और संशोधित पंजीयन का काम सम्पन्न होना बड़ी उपलब्धि रही।

विशेष विवरण :-   क्रमश:

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