आत्मा की खोज के लये शव का परिक्षण किया- ऋषि दयानन्द का स्वलिखित जीवनवृत – चतुर्थ भाग

आत्मा की खोज के लये शव का परिक्षण किया-  ऋषि दयानन्द का स्वलिखित जीवनवृत – चतुर्थ भाग  

मैं स्वामी दयानन्द सरस्वती संक्षेप से अपना जन्म चरित्र लिखता हूँ।।

कई वनों और पर्वतों से होता हुआ चिलका घाटी से उतर कर मैं अन्ततः रामपुर [‘रामनगर’] पहुँच गया।  वहाँ पहुँच कर मैंने प्रसिद्ध‌ रामगिरि के स्थान पर निवास किया।  यह पुरुष पवित्राचार और आध्यात्मिक जीवन के कारण अति प्रसिद्ध‌ था।  मैँने उसको विचित्र प्रकृति का पुरुष पाया।  अर्थात वह सोता नहीं था, वरन् सारी सारी रातें उच्चस्वर से बातें करने में व्यतीत करता।  वह बातें प्रकट में अपने साथ करता हुआ ही प्रतीत होता था।  प्रायः हमने उच्च स्वर से चीख मारते हुये उसे सुना।  पर वस्तुतः जब उठ कर देखा तो उसके कमरे में उसके अतिरिक्त और कोई पुरुष दिखाई न दिया।  मैं ऐसी वार्ता से अत्यन्त विस्मित हुआ।  जब मैंने उसके चेलों और शिष्यों से पूछा तो उन विचारों ने केवल यही उत्तर दिया कि इनकी प्रकृति ही है।  पर मुझे यह कोई न बता सका कि इसका क्या रहस्य है।  अन्त को स्वयं जब मैंने उस साधु से कई बार एकान्त में चर्चा की तो मुझे ज्ञात हो गया कि वह क्या बात थी।  इस प्रकार मैं यह निश्चय करने के योग्य हो गया कि अभी वह जो कुछ करता है वह पूरी पूरी योग विद्या का फल नहीं है, प्रत्युत पूरी में अभी उसे न्यूनता है और यह वह वस्तु नहीं कि जिसकी मुझे जिज्ञासा है।  यह पूरा योगी नहीं यद्यपि योग में कुछ गति रखता है|

उससे [रामगिरि स्थान से] चलकर मैं काशीपुर गया।  वहाँ से द्रोण सागर जा पहुँचा।  वहीं मैंने शरद् ऋतु काटा।  हिमालय पर्वत पर पहुँच कर देह त्याग करना चाहिये, ऐसी इच्छा हुई।  परन्तु मन में यह विचार आ गया कि ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् ही देह छोड़ना चाहिये।  अतः वहां से मुरादाबाद होता हुआ सम्भल आ पहुँचा।  वहाँ से गढ़मुक्तेश्वर होते हुये पुनः मैं गंगा तट पर आ निकला। उस समय अन्य धार्मिक पुस्तकों के अतिरिक्त मेरे पास निम्नलिखित पुस्तकें भी थीं।  शिव संहिता, हठ योग प्रदीपिका, केशाराणि संगीत (?) प्रायः मैं इन्हीं पुस्तकों को यात्रा में पढ़ा करता था।  उनमें से कई पुस्तकों का विषय नाड़ी चक्र था।  पर उनमें इस विषय का इतना लम्बा चौड़ा विवरण था कि पुरुष पढ़ता पढ़ता थक जाता।  मैं उन्हें कभी भी पूर्णतया अपनी बुद्धि में न ला सका।  अतः मुझे विचार हुआ कि न जाने ये सत्य भी है या नहीं।  ऐसा संदेह होता ही गया, यद्यपि मैं अपने संशय मिटाने का यत्न करता रहा।  परन्तु वह संदेह दूर न हुये और न ही उनके दूर करने का कोई अवसर प्राप्त हुआ।

एक दिन दैव संयोग से एक शव मुझे नदी में बहता हुआ मिला।  तब समुचित अवसर प्राप्त हुआ कि उसकी परीक्षा करता।  सो उन पुस्तकों को जो मेरे पास थीं, समीप ही एक और रख, वस्त्रों को ऊपर उठा मैं नदी के भीतर गया और शीघ्र वहाँ जा शव को पकड़ तट पर आया।  मैंने तीक्ष्ण चाकू से जैसा हो सका यथायोग्य काटना प्रारम्भ किया और हृदय को उसमें से निकाल लिया और ध्यानपूर्वक देख परीक्षा की।  अब पुस्तकोल्लिखित वर्णन की उससे तुलना करने लगा।  ऐसे ही शिर और ग्रीवा को काट कर सामने रक्खा।  यह निश्चय करके कि दोनों अर्थात् पुस्तक और शव लेशमात्र भी परस्पर नहीं मिलते, मैंने पुस्तकों को फाड़ उनके टुकड़े कर डाले और शव को फेंक साथ ही पुस्तकों के टुकड़ों को भी नदी में फेंक दिया।  उसी समय से शनैः शनैः मैं यह परिणाम निकालता गया कि वेदों, उपनिषदों, पातञ्जल और सांख्य शास्त्र के अतिरिक्त अन्य समस्त पुस्तकें जो विज्ञान और योग विद्या पर लिखी गयीं मिथ्या और अशुद्ध हैं।  ऐसे ही कुछ दिन और गंगा तीर पर विचरते हुये फरूखाबाद पहुँचा।  और श्रृंगीराम पुर से होकर छावनी की पूर्व दिशा वाली सड़क से कानपुर जाने वाला था, जब संवत् 1912 विक्रम समाप्त हुआ।

(डा. रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान कृत ‘महर्षि दयानन्द जीवन वृत और कृतित्व’ से साभार उदृत‌).

प्रस्तुत कर्ता – डॉ मधु सूदन व्यास उज्जैन

  1913 वि. अगले पाँच मास में कानपुर व प्रयाग के मध्यवर्ती अनेक प्रसिद्ध स्थान मैंने देखे।  भाद्रपद के प्रारम्भ में मिर्जापुर पहुँचा।  वहाँ एक मास से अधिक विंध्याचल अशोलजी के मन्दिर में निवास किया।  असूज के आरम्भ में काशी पहुँचा।  वहाँ जाके मैं उस गुफा में ठहरा जो वरणा और गंगा के संगम पर है।  और जो उस समय भवानन्द सरस्वती के अधिकार में थी।  वहाँ पर कई शास्त्रियों अर्थात काकाराम, राजाराम आदि से मेरा परिचय हुआ परन्तु वहाँ केवल 12 दिन रहा  -दुष्कर स्थानों पर खोजा- ऋषि दयानन्द का स्वलिखित जीवनवृत – पंचम भाग 

1046total visits,2visits today

About bandhu

Chetan Joshi - Administrator