ऋषि दयानन्द का स्वलिखित जीवनवृत – (प्रथम भाग)

ऋषि दयानन्द का स्वलिखित जीवनवृत – (प्रथम भाग)

(डा. रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान कृत ‘महर्षि दयानन्द जीवन वृत और कृतित्व’ से साभार उदृत‌).प्रस्तुत कर्ता – डॉ मधु सूदन व्यास उज्जैन

मैं स्वामी दयानन्द सरस्वती संक्षेप से अपना जन्म चरित्र लिखता हूँ।।

संवत 1881 के वर्ष में मेरा जन्म दक्षिण गुजरात प्रान्त देश काठियावाड़ का मजोकठा देश मोर्वी का राज्य में औदीच्य ब्राह्मण के घर में हुआ था, यहां अपना पिता का और निज निवास स्थान के प्रसिद्ध नाम इसलिये मैं नहीं लिखता, कि जो माता पिता आदि जीते हों, मेरे पास आवें तो इस सुधार के कार्य में विघ्न हो क्योंकि मुझको उनकी सेवा करना उनके साथ घूमने में श्रम और धन आदि का व्यय कराना नहीं चाहता।  

मैंने पांचवे वर्ष में देवनागरी अक्षर पढ़ने का आरम्भ किया था।  और मुझको कुल की रीति की शिक्षा भी माता पिता आदि किया करते थे, बहुत से ध्रर्मशास्त्रादि के श्लोक और सूत्रादिक कण्ठस्थ कराया करते थे।  फिर आठवें वर्ष में मेरा यज्ञोपवीत कराके गायत्री संध्या और उसकी क्रिया भी सिखा दी गयी थी।  और मुझको यजुर्वेद की संहिता का आरम्भ कराके उसमें से प्रथम रुद्राध्याय पढ़ाया गया था, और मेरे कुल में शैव मत था उसी की शिक्षा भी किया करते थे।  और पिता आदि लोग यह भी कहा करते थे कि पार्थिवपूजन अर्थात मट्टी का लिङ्ग बना के तूँ पूजा कर।  और माता मने किया करती थी कि यह प्रातःकाल भोजन कर लेता है इससे पूजा नहीं हो सकेगी पिताजी हठ किया करते थे कि पूजा अवश्य करनी चाहिये क्योंकि कुल की रीति है।  तथा कुछ कुछ व्याकरण का विषय और वेदों का पाठमात्र भी मुझको पढ़ाया करते थे।  पिताजी अपने साथ मुझको जहां तहां मंदिर और मेल मिलापों में ले जाया करते और यह भी कहा करते थे कि शिव की उपासना सबसे श्रेष्ठ है।

इस प्रकार 14 वर्ष की अवस्था के आरम्भ तक यजुर्वेद की संपूर्ण और कुछ अन्य वेदों का भी पाठ पूर्ण हो गया था, और शब्दरूपावली आदि व्याकरण के ग्रन्थ भी पूरे हो गये थे।  पिता जी जहाँ जहाँ शिवपुराण की कथा होती थी, वहां वहां मुझको बैठकर सुनाया करते थे।  और घर में भिक्षा की जीविका नहीं थी किन्तु जमींदारी और लेनदेन से जीविका के प्रबन्ध करके सब काम चलाते थे।  और मेरे पिता ने माता के मने करने पर भी पार्थिव पूजन का आरम्भ करा दिया था।

जब शिवरात्रि आई तब 13 त्रयोदशी के दिन कथा का महात्म्य सुना के शिवरात्रि के व्रत करने का निश्चय करा दिया।  परन्तु माता ने मने भी किया कि इससे व्रत नहीं रहा जयगा, तथापि पिताजी ने व्रत का आरम्भ करा दिया। और जब 14 चतुर्दशी को शाम हुई तब बड़े बड़े बस्ती के रईस अपने पुत्रों के सहित मन्दिर में जागरण करने को गये वहां मैं भी अपने पिता के साथ गया और प्रथम प्रहर की पूजा भी करी दूसरे प्रहर की पूजा करके पुजारि लोग बाहर निकल के सो गये।  मैंने प्रथम से सुन रखा था कि सोने से शिवरात्रि का फल नहीं होता है।  इसलिये अपनी आंखों में जल के छींटे मार के जागता रहा और पिता भी सो गये तब मुझको शंका हुई कि जिसकी मैंने कथा सुनी थी वही यह महादेव है वा अन्य कोई क्योंकि वह तो मनुष्य के माफिक एक देवता है।  वह बैल पर चढ़ता, चलता फिरता, खाता पीता, त्रिशूल हाथ में रखता डमरु बजाता, वर और शाप देता और कैलाश का मालिक है इत्यादि प्रकार का महादेव कथा में सुना था, तब पिता जी को जगा के मैने पूछा कि यह कथा का महादेव है या कोई दूसरा तब पिता ने कहा कि क्यों पूछता है।  तब मैंने कहा कि कथा का महादेव तो चेतन है वह अपने ऊपर चूहों को क्यों चढ़ने देगा और इसके ऊपर तो चूहे फिरते हैं।

 पिताजी ने कहा कि कैलाश पर जो महादेव रहते हैं, उनकी मूर्ति बना और आवाहन करके पूजा किया करते हैं अब इस कलियुग में शिव का साक्षात दर्शन नहीं होता।  इसलिये पाषाणादि की मूर्ति बना के उन महादेव की भावना रख कर पूजन करने से कैलाश का महादेव प्रसन्न हो जाता है।

ऐसा सुन के मेरे मन में भ्रम हो गया कि इनमें कुछ गड़्बड़ अवश्य है।  और भूख भी बहुत लग रही थी पिता से पूछा कि मैं घर को जाता हूँ।  तब उन्होंने कहा कि सिपाही को साथ लेके चला जा परन्तु भोजन कदाचित मत करना मैने घर में जाकर माता से कहा कि मुझको भूख लगी है।  माता ने कुछ मिठाई आदि दिया उसको खाकर 1 एक बजे पर सो गया।

 पिताजी प्रातः काल रात्रि के भोजन को सुनके बहुत गुस्से हुये कि तैने बहुत बुरा काम किया।  तब मैने पिता से कहा कि यह कथा का महादेव नहीं है इसकी पूजा मैं क्यों करूँ।  मन में तो श्रद्धा नहीं रही परन्तु ऊपर के मन पिताजी से कहा कि मुझको पढ़ने से अवकाश नहीं मिलता कि मैं पूजा कर सकूं।  तथा माता और चाचा आदि ने भी पिता को समझाया इस कारण पिता भी शान्त हो गये कि अच्छी बात है पढ़ने दो। फिर निघण्टू, निरुक्त और पूर्वमीमांसा आदि शास्त्रों के पढ़ने की इच्छा करके आरम्भ करके पढ़ता रहा और कर्मकाण्ड विषय भी पढ़ता रहा।

मुझसे छोटी 1 एक बहन फिर उससे छोटा एक भाई फिर भी एक बहन और एक भाई अर्थात दो बहन और दो भाई और हुए थे तब तक मेरी 16 वर्ष की अवस्था हुई थी।  पीछे मुझसे छोटी 14 वर्ष की जो बहन थी उनको हैजा हुआ एक रात्रि में कि जिस समय‌ नाच हो रहा था| नौकर ने खबर दी कि उसको हैजा हुआ है।  तब सब जने वहां से तत्काल आये और वैद्य आदि बुलाये औषधि भी की तथापि चार घण्टे में उस बहन का शरीर छूट गया सब रोने लगे।

परन्तु मेरे हृदय में ऐसा धक्का लगा और भय हुआ कि ऐसे ही मैं मर जाउंगा शोच विचार में पढ़ गया।  जितने जीव संसार में हैं उनमें से एक भी न बचेगा।  इससे कुछ ऐसा उपाय करना चाहिए कि जिससे यह दुःख छूटे और मुक्ति हो अर्थात इसी समय से मेरे चित्त में वैराग्य की जड़ पड़ गई।  परन्तु यह विचार अपने मन में ही रक्खा किसी से कुछ भी न कहा।  इतने में 19 वर्ष की जब अवस्था हुई तब जो मुझसे अति प्रेम करने वाले बड़े धर्मात्मा विद्वान मेरे चाचा थे उनकी मृत्यु होने से अत्यन्त वैराग्य हुआ कि संसार में कुछ भी नहीं परन्तु यह बात माता पिता से तो नहीं कही किन्तु अपने मित्रों से कहा कि मेरा मन गृहाश्रम करना नहीं चाहता।  उन्होंने माता पिता से कहा माता पिता ने विचारा कि इसका विवाह शीघ्र कर देना चाहिये।

जब मुझको मालुम पढ़ा कि ये 20 बीस‌वें वर्ष में ही विवाह कर देंगें तब मित्रों से कहा कि मेरे माता पिता को समझा दो अभी विवाह न करें।  तब उन्होंने एक वर्ष जैसे तैसे विवाह रोका तब 20 बीसवां वर्ष पूरा हो गया।  तब मैंनें पिताजी से कहा कि मुझे काशीं में भेज दीजिये कि मैं व्याकरण ज्योतिष और वैद्यक आदि (के) ग्रन्थ पढ़ पाऊँ।  तब माता पिता और कुटुम्ब के लोगों ने कहा कि हम काशीं को कभी न भेजेंगे जो पढ़ना हो सो यहीं पढ़ो।  और अगले साल में तेरा विवाह भी होगा।  क्योंकि लड़की वाला नहीं मानता।  और हमको अधिक पढ़ा के क्या करना है जितना पढ़ा है वही बहुत है।

फिर मैंने पिता आदि से कहा कि मैं पढ़ कर आऊँ तब विवाह होना ठीक है तब माता भी विपरीत हो गई कि हम कहीं नहीं भेजते और अभी विवाह करेंगे।  तब मैंने चाहा कि अब सामने रहना अच्छा नहीं।  फिर तीन कोश ग्राम में अपनी जिमींदारी थी वहां एक अच्छा पण्डित था माता पिता की आज्ञा लेकर वहां जाकर उस पण्डित के पास मैं पड़ने लगा।  और वहां के लोगों से भी कहा कि मैं गृहाश्रम करना नहीं चाहता।

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