औदीच्य ब्राह्मण समाज ब्रिटिश इतिहासज्ञ श्री रेवरेण्‍ड एम ए शेरिेंग की नजर से|

औदीच्‍य ब्राहमण समाज
ब्रिटिश समाज शास्त्री एवं इतिहासज्ञ श्री रेवरेण्‍ड एम ए शेरिेंग  व्‍दारा लन्‍दन से सन 1872 में  लिखित ग्रन्‍थ  ‘हिन्‍दू ट्राईब्‍स एंड कास्‍टस एस रिप्रजेण्‍टेड इन बनारस‘ जिसका प्रकाशन दो खण्‍डों में हुआ था, ने बनारस को मुख्‍यालय बनाकर तथा भ्रमण कर देश के सभी क्षेत्रों में आबाद हिन्‍दुओं की समस्‍त जातियों और उनके रीति रिवाज के संबंध में न केवल अध्‍ययन किया वरन विस्‍त्रत जानकारी संकलित की थी ।

   भारत में ब्राहमणों की कितनी जातियां है?  यह सदैव ही जिज्ञासा का विषय रहा है। इस जिज्ञासा का समाधान रेवरेंड शेरिंग ने उस काल में पहली बार करने का प्रयास किया। उन्‍होने इस ग्रन्‍थ् में ब्राहमणों की लगभग दो हजार जातियों का वर्णन किया है। उनका यह भी मत था, कि यह संख्‍या भी पूरी नहीं हुई है।

    ब्राहमणों की जातियों को उन्‍होने भोगोलिक आधार पर दो भागों में तथा उत्‍तर भारत ओर दक्षिण भारत के रूप में विभक्‍त किया था। नर्मदा के उत्‍तरी क्षेत्र के ब्राहमणों को  ‘‘गौड ब्राहमणों” के समूह में तथा दक्षिण क्षेत्र के बा्हमणों को ‘‘द्रविड ब्राहमणों” के समूह में वर्गीक्रत किया है । गौड ब्राहमणों के वर्ग में कान्‍यकुुब्‍ज, सारस्‍वत, गौड, मैथिल ओर उत्‍कल ब्राहमण तथ द्रविड ब्राहमण के वर्ग में महाराष्‍टीयन, गुर्जर, तैलंग द्रविड तथा कर्नाटक ब्राहमणों को सम्मिलित किया गया है।

     “औदीच्‍य ब्राहमण”
रेवरेंड शेरिंग ने गुर्जर ब्राहमणों की 84 शाखाओं में से औदीच्‍य ब्राहमणों को प्रमुख ब्राह्मण जाति के रूप में स्‍थान दिया है। उस समय औदीच्‍य ब्राहमण गुजरात के उत्‍तरी भाग में कच्‍छ और केम्‍बे की खाडी के पश्चिम क्षेत्र में मुख्‍य रूप से आबाद थे। औदीच्‍य ब्राहमण समुदाय के ब्राहमण ग्‍यारह शाखाओं में विभक्‍त थे। इन ग्‍यारह शाखाओं में से निम्‍नलिखित तीन शाखाओं को प्रमुख शाखाओं के रूप में माना गया है 1- सिध्‍दपुरा औदीच्‍य  2- सिहोर औदीच्‍य  3 – टोलकिया औदीच्‍य इन तीन शाखाओं को तत्‍कालीन समय में समाज में महत्‍वपूर्ण स्‍थान प्राप्‍त था, और उनकी विशिष्‍ठ हैसियत थी। उस समय इनमें परस्‍पर वैवाहिक संबंध तो स्‍थापित नहीं होते थे, पर भोजन व्‍यवहार की अनुमति थी।
उपर्युक्‍त तीन शाखाओं के अतिरिक्त औदीच्‍य ब्राहमणों की 8 शाखाएं भी उक्‍त पुस्‍तक में वर्णित हें|

बनारस में औदीच्‍य ब्राहमण्‍ा ”
रेवरिेग शेरिंग ने अपनी पुस्‍तम में लिखा हे कि बनारस में उस समय गुर्जर (गुजरती) ब्राह्मणों की संख्‍या भी कई हजार थी, जो लगभग 500 परिवारों से संबंधित थे । इनमें सर्वाधिक संख्‍या में बाम्‍बे प्रेसिडेन्‍सी के सध्दिपुर पाटन क्षेत्र से आकर बसे औदीच्‍य ब्राहमणों की थी| उन्‍होने इनके वंश गौत्र तथा उपनाम का वर्णन भ्‍ाी किया है। बनारस में आबाद औदीच्‍यों में से अधिकांश काफी सम्‍पन्‍न थे। इनके आवास बनारस के रामघाट तथा दुर्गाघाट के रिहायशी इलाके में थे। ओदीच्‍य ब्राहमण वेद, व्‍याकरण, एवं पुराण के प्रकाण्‍ड पण्डित एवं शिक्षक थे। वे हिन्‍दू धर्म ग्रन्‍थों के विव्‍दान थे। इनके व्‍दारा पुरोहित के रूप में धार्मिक संस्‍कार भी सम्‍पन्‍न किये जाते थे। ज्‍योतिष संबंधी कार्य भी करते थे|  उन्‍होने अपनी पुस्‍तक में समस्‍त गौत्र, सोलह संस्‍कार की जानकारी एवं उपनयन एवं विवाह संस्‍कार की पूरी विधि भी बताई है। इसी प्रकार अंतिम संस्‍कार के संबंध में विस्‍त्रत जानकारी दी गई है । इस प्रकार रेवरेण्‍ड ने बनारस के औदीच्‍य समुदाय को मुख्‍य आधार मानकर तत्‍कालीन परम्‍पराओं का उल्‍लेख किया है।

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