औदीच्य रत्न “महिर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती “

औदीच्य रत्न , भारत निर्माता   “महिर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती “

अंध रूडी वादिता .और महंतो मठाधीशो एवं पण्डे पुजारियों के जंजाल में उलझे भारतीय समाज को नया प्रकाश देकर भीर से अपने पेरो पर खड़ा करने का सत्प्रयास किया| वेदों की मोलिक आधार शिला रखी|  धर्म में व्याप्त रूडी वादिता पाखंड, और अंध विश्वास का विरोध कर वैदिक संस्कृति की पताका फहराई|

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती (१८२४-१८८३) आधुनिक आर्यावर्त (भारत) के महान चिन्तक, समाज-सुधारक व देशभक्त थे।

     1- प्रारम्भिक जीवन

स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म भारत के गुजरात प्रान्त के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित टंकारा ग्राम के निकट मोरवी रियासत के एक सहस्त्र औदीच्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम मूलशंकर था। उनका प्रारम्भिक जीवन बहुत आराम से बीता। आगे चलकर एक पण्डित बनने के लिए वे संस्कृत, वेद शास्त्रों व अन्य धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन में लग गए।

उनके जीवन में ऐसी बहुत सी घटनायें हुईं, जिन्होंने उन्हें हिन्दू धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर के बारे में पूछने के लिए विवश कर दिया। एक बार शिव-रात्रि की घटना है। तब वे बालक ही थे। शिव-रात्रि के उस दिन उनका पूरा परिवार रात्रि पूजा के लिए एक मन्दिर में ही रुका हुआ था। सारे परिवार के सो जाने के पश्चात् भी वे जागते रहे कि भगवान शिव आयेंगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे। उन्होंने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं। यह देखकर वे बहुत आश्चर्यचकित हुए और सोचने लगे की जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की क्या रक्षा करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए।अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु से वे जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और ऐसे प्रश्न करने लगे जिससे उनके माता पिता चिन्तित रहने लगे। तब उनके माता-पिता ने उनका विवाह किशोरावस्था के प्रारम्भ में ही करने का निर्णय किया (१९ वीं सदी के आर्यावर्त (भारत) में यह आम प्रथा थी)। लेकिन बालक मूलशंकर ने निश्चय किया कि विवाह उनके लिए नहीं बना है और वे १८४६ में घर से भाग गए।

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गुरु की खोज में  

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी सत्य को जानने की अभिलाषा से घर परिवार त्यागकर सच्चे गुरू की खोज में निकल पड़े। इस दोरान 1857 के अंग्रजों के विरुद्ध क्रांति के सूत्र धार  बने। १८५७ की क्रान्ति के लगभग  दो वर्ष बाद  भारत के अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए वे सन् १८६० में गुरूवर स्वामी विरजानन्द के आश्रम में पहुंचे। जहां उन्हें नई दृष्टि, सद्प्रेरणा और आत्मबल मिला। वर्षों तक भ्रमण करने के बाद जब वे भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में गुरू विरजानन्द जी की कुटिया पर पहुंचे तो गुरू विरजानन्द ने उनसे पूछा कि वे कौन हैं। तब स्वामी दयानन्द ने कहा, गुरूवर यही तो जानना चाहता हूं कि वास्तव में, मैं कौन हूं? प्रश्न के उत्तर से संतुष्ट होकर गुरूवर ने दयानन्द को अपना शिष्य बनाया।

स्वामी विरजानन्द उच्च कोटि के विद्वान थे, उन्होंने वेद मंत्रों को नई दृष्टि से देखा था, और वेदों को एक नवीन व्यवस्था प्रदान की थी। उन्होंने दयानन्द जी को वेद शास्त्रों का अभ्यास कराया। अध्ययन पूरा होने के बाद जब दयानन्द जी गुरू विरजानन्द जी को गुरू दक्षिणा के रूप में थोडी से लौंग, जो गुरू जी को बहुत पसन्द थी लेकर गये तो गुरू जी ने ऐसी दक्षिणा लेने से मना कर दिया। उन्होंने दयानन्द से कहा कि गुरू दक्षिणा के रूप में, मैं यह चाहता हूं कि समाज में फैले अन्ध विश्वास और कुरीतियों को समाप्त करो। गुरू जी के आदेश के अनुसार स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक उत्थान में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। महर्षि दयानन्द १८६३ में शिक्षा प्राप्त कर गुरु की आज्ञा से धर्म-सुधार हेतु ने अनेक स्थानों की यात्रा की। उन्होंने हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर पाखण्ड खण्डिनी पताका फहराई। उन्होंने अनेक शास्त्रार्थ किए। वे कलकत्ता में बाबू केशवचन्द्र सेन तथा देवेन्द्र नाथ ठाकुर के संपर्क में आए। यहीं से उन्होंने पूरे वस्त्र पहनना तथा आर्यभाषा (हिन्दी) में बोलना व लिखना प्रारंभ किया।

यहीं उन्होंने तत्कालीन वाइसराय को कहा था, मैं चाहता हूं विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है। परंतु भिन्न-भिन्न भाषा, पृथक-पृथक शिक्षा, अलग-अलग व्यवहार का छूटना अति दुष्कर है। बिना इसके छूटे परस्पर का व्यवहार पूरा उपकार और अभिप्राय सिद्ध होना कठिन है।

महर्षि दयानन्द के हृदय में आदर्शवाद की उच्च भावना, यथार्थवादी मार्ग अपनाने की सहज प्रवृत्ति, मातृभूमि की नियति को नई दिशा देने का अदम्य उत्साह, धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से युगानुकूल चिन्तन करने की तीव्र इच्छा तथा आर्यावर्तीय (भारतीय) जनता में गौरवमय अतीत के प्रति निष्ठा जगाने की भावना थी। उन्होंने किसी के विरोध तथा निन्दा करने की परवाह किये बिना आर्यावर्त (भारत) के हिन्दू समाज का कायाकल्प करना अपना ध्येय बना लिया था।

       आगे देखें क्लिक लिंक-

2- स्वामी दयानंद सरस्वती के वैचारिक आन्दोलन, शास्त्रार्थ एवं व्याख्यान

 3-स्वामी दयानंद  सरस्वती- समाज सुधार  स्वतंत्रता संग्राम के सूत्र धार |

4  – स्वामी-  दयानंद सरस्वती   अंग्रेजो द्वारा प्रलोभन हत्या का षड्यंत्र और अंतिम शब्द?

  2- वैचारिक आन्दोलन, शास्त्रार्थ एवं व्याख्यान

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