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घर छोड़ कर क्यों भागना पड़ा-ऋषि दयानन्द का स्वलिखित जीवनवृत – द्वितीय भाग| – AudichyaBandhu.org

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घर छोड़ कर क्यों भागना पड़ा-ऋषि दयानन्द का स्वलिखित जीवनवृत – द्वितीय भाग|

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घर छोड़ कर क्यों भागना पड़ा –ऋषि दयानन्द का स्वलिखित जीवनवृत – द्वितीय भाग

मैं स्वामी दयानन्द सरस्वती संक्षेप से अपना जन्म चरित्र लिखता हूँ।।

जब माता पिता ने मुझे बुला के विवाह की तैयारी कर दी तब तक 21 इक्कीसवां वर्ष भी पूरा हो गया।  तब मैंने निश्चित जाना कि अब विवाह किये बिना कदाचित् न‌ छोड़ेंगे।  फिर चुपचाप संवत 1903 के वर्ष घर छोड़ के सन्ध्या के समय भाग उठा चार कोश पर एक ग्राम था वहां जाकर रात्रि को ठहर कर दूसरे दिन प्रहर रात्रि से उठ के 15 कोश चला परन्तु प्रसिद्ध‌ ग्राम सड़क और जानकारों के ग्रामों को छोड़ के बीच बीच में नित्य चलने का प्रारम्भ किया।

 तीसरे दिन मैंने किसी राजपुरुष से सुना कि फलाने का लड़का घर छोड़ कर चला गया उसको खोजने के लिये सवार और पैदल आदमीं यहां तक आये थे।  जो मेरे पास से थोड़े से रुपये और अंगूठी आदि भुषण था वह सब पोपों ने ठग लिया।  मुझसे कहा कि तुम पक्के वैराग्यवान तब होंगे कि जब अपने पास की चीज सब पुण्य कर दो फिर उन लोगों के कहने से मैंने जो कुछ था सब दे दिया।

 फिर लाला भगत की जगह जो कि सायले शहर में है वहां बहुत साधुओं को सुन कर चला गया वहां एक ब्रह्मचारी मिला उसने मुझसे कहा कि तुम नैष्टिक बृह्मचारी हो जाओ उसने मुझ्को ब्रह्मचारी की दीक्षा दी और शुद्ध चैतन्य मेरा नाम रक्खा तथा काषाय वस्त्र भी करा दिये।

 जब मैं वहां से अहमदाबाद के पास कोठगांगड़ जो कि छोटा सा राज्य है वहां आया तब मेरा ग्राम के पास वाला एक वैरागी मिला उसने पूछा कि तुम यहां कहां से आये और कहां जाना चाहते हो।  तब उससे मैने कहा कि घर से आया और कुछ देशभ्रमण किया चाहता हूँ।  उसने मुझसे कहा कि तुमने काषाय वस्त्र धारण करके क्या घर छोड़ दिया।  मैंने कहा कि हां मैंने घर छोड़ दिया और कार्त्तिकि के मेले पर् सिद्धपुर को जाऊंगा।

फिर मैं वहां से चल कर सिद्धपुर में आके नीलकण्ठ महादेव की जगह में ठहरा कि जहां दण्डी स्वामी ब्रह्मचारी ठहर रहे थे।  उनका सत्संग और जो जो कोई महात्मा वा पण्डित मेले में सुन पड़ा उन सबके पास गया और उनसे सत्संग किया।

जो मुझको कोठगांगड़ में वैरागी मिला था उसने मेरे पिता के पास पत्र भेजा कि तुम्हारा पुत्र ब्रह्मचारी हुआ काषाय वस्त्र धारण किये मुझको मिला और कार्त्तिकी के मेले में सिद्धपुर को गया।  ऐसा सुन के सिपाहियों के सहित पिताजी सिद्धपुर के मेले में खोज कर पता लगाके जहां पण्डितों के बीच मैं बैठा था वहां पहुँच कर मुझसे बोले कि तूं हमारे कुल में कलंक लगाने वाला पैदा हुआ।  तब मैंने पिताजी की और देख के उठके चरणस्प‌र्श किया और नमस्कार करके बोला कि आप क्रोधित मत हूजिये मैं किसी आदमीं के बहकाने से चला आया और मैने बहुत सा दुख पाया।  अब मैं घर को आने वाला था।  परन्तु अब आप आये यह बहुत अच्छा हुआ कि अब मैं साथ साथ घर को चलूंगा।

तो भी क्रोध के मारे मेरे गेरू के रंगे वस्त्र और एक तूंबे को तोड़ फार‌ के फेंक दिये और वहां भी बहुत कठिन कठिन बातें कह कर बोले कि तूं अपनी माता की हत्या किया चाहता है।  मैने कहा कि मैं अब घर को चलूंगा तो भी मेरे साथ सिपाही कर दिये कि क्षण भर भी इसको अकेला मत छोड़ो और इस पर रात्री को भी पहरा रक्खो।  परन्तु मैं भागने का उपाय देख रहा था।  सो जब तीसरी रात के तीन बजे के पीछे पहरे वाला बैठा बैठा सो गया उसी समय मैं लघुशंका का बहाना करके भागा।

आध कोश पर एक मन्दिर के शिखर की गुफा में एकवृक्ष के सहारे से चढ़ और जल का लोटा भर के छिपकर बैठा रहा जब चार बजे का अमल हुआ तब मैंने उन्हीं सिपाहियों में से एक सिपाही मालियों से मुझको पूछता सुना तब मैं और भी छिप गया ऊपर बैठा सुनता रहा वे लोग ढूंढ कर चले गये मैं उसी मन्दिर के शिखर में दिन भर रहा।  जब अन्धेरा हुआ तब उस पर से उतर सड़क को छोड़ के किसी को पूछ के दो कोश पर एक ग्राम था उसमें ठहर् के अहमदाबाद होता हुआ बड़ोदरे शहर में आकर ठहरा।  वहां चेतन मठ में ब्रह्मानन्द आदि ब्रह्मचारी और सन्यासियों सेअ वेदान्त विषय की बहुत बातें की।  और मैं ब्रह्म हूं अर्थात जीव ब्रह्म एक है ऐसा निश्चय उन ब्रह्मानन्दादि ने मुझको करा दिया।

प्रथम वेदान्त पड़ते समय भी कुछ कुछ निश्चय हो गया था परन्तु वहां ठीक दृड़ हो गया कि मै ब्रह्म हूं।  फिर वहीं बड़ोदे में एक बनारसीबाई वैरागी का स्थान‌ सुनकर उसमें जाके एक सच्चिदानन्द प्रमहंस से भेंट करके अनेक प्रकार की शास्त्र विषयक बात हुई फिर वहां सुना कि आजकल चाणोदकन्याली में बड़े बड़े संन्यासी ब्रह्मचारी और विद्वान ब्राह्मण रहते हैं।  वहां जाके दीक्षित और चिदाश्रमादि स्वामी ब्रह्मचारी और पण्डितों से अनेक विषयों पर पर‌स्पर संभाषण हुआ।

फिर एक परमानन्द परमहंस से वेदान्तसार आर्य्याहरिमीडे तोटक वेदान्तपरिभाषा आदि प्रकरणों का थोड़े महीनों में विचार कर लिया।  उस समय ब्रह्मचर्यावस्था में कभी कभी अपने हाथ से रसोई बनाने पड़ती थी इस कारण पढ़ने में विघ्न विचार के चाहा कि अब संन्यास ले लेना अच्छा है।  फिर एक दक्षिणी पण्डित के द्वारा वहां जो दीक्षित स्वामी विद्वान थे उनको कहलाया कि आप उस ब्रह्मचारी को संन्यास की दीक्षा दे दीजिये। क्योंकि मैं अपना ब्रह्मचारी का नाम भी बहुत प्रसिद्ध नहीं करना चाहता था क्योंकि घर का भय बड़ा था जोकि अब तक बना है।  तब उन्होंने कहा कि उसकी अवस्था कम है इसलिये हम नहीं देते।

इसके अनन्तर दो महीने के पीछे दक्षिण से एक दण्डी स्वामी और एक ब्रह्मचारी आके चणोद से कुछ कम कोश भर जो मकान जो जंगल में था उसमें ठहरे उनको सुनकर एक दक्षिणी वेदान्ती पण्डित और मैं दोनों उसके पास जाके शास्त्रविषयक संभाषण करने से मालुम हुआ कि अच्छे विद्वान हैं।  और वे श्रृंगीरी मठ की और से आके द्वारिका की और जाते थे उनका नाम पूर्णानन्द सरस्वती था।  उनसे उस वेदान्ति के द्वारा कहलाया कि ये ब्रह्मचारी विद्या पढ़ना चाह्ते हैं।  यह मैं ठीक जानता हूं कि किसी प्रकार का अपगुण इनमें नहीं है इनको आप संन्यास दे दीजिये संन्यास लेने का इनका प्रयोजन यही है कि निविघ्न विद्या का अभ्यास कर सकें।

तब उन्होंने कहा कि किसी गुजराती स्वामी से कहो क्योंकि हम तो महाराष्टृ हैं।  तब उनसे कहा कि दक्षीणी स्वामी गौड़ों को भी संन्यास देते हैं तो यह ब्रह्मचारी तो पंच द्रविड़ है इससे क्या चिन्ता है।  तब उन्होंने मान लिया और उसी ठिकाने तीसरे दिन संन्यासी की दीक्षा दण्ड ग्रहण कराया और दयानन्द सरस्वती नाम रक्खा। परन्तु दण्ड का विसर्जन भी उसी स्वामी जी के साम्ह‌ने कर दिया क्योंकि दण्ड की भी बहुत सी क्रिया है कि जिससे पढ़्ने में विघ्न हो सकता था।  फिर वे स्वामी जी द्वारिका की और चले गये।

मैं कुछ दिन चाणोदकन्याली में रहके व्यासश्रम में एक योगानन्द स्वामी को सुना कि वे योगाभ्यास में अच्छे हैं उनके पास जाके योगाभ्यास की क्रिया सीख कैक कृष्ण शास्त्री छिलौर शहर के बाहर रहते थे उनको सुनके व्याकरण पढ़ने के लिये उनके पास गया और कुछ व्याकरण का अभ्यास करके फिर चाणोद में आकर ठहरा वहां दो योगी मिले जिनका नाम ज्वालानन्दपुरी और शिवानन्द गिरी था।  उनसे भी योगाभ्यास की बातें हुईं और उन्होंने कहा कि तुम अहमदाबाद में आओ वहां हम नदी के ऊपर दूधेश्वर महादेव में ठहरेंगे।  वहां आओगे तो योगाभ्यास की रीति सिखलायेंगे।  वहां से वे अहमदाबाद को चलेअ गये फिर एक महीने के पीछे मैं भी अहमदाबाद में जाके उनसे मिला और योगाभ्यास की रीति सीखी।  फिर आबूराज पर्वत में योगियों को सुन के वहां जाके अर्व‌दाभवानी आदि स्थानों में भवानी गिरि आदि योगियों से मिल के कुच्छ योगाभ्यास की रीति सीख के संवत1911 के वर्ष के अन्त में हरद्वार के कुम्भ के मेले में आके बहुत साधु संन्यासियों से मिला और जब तक मेला रहा तब तक चण्डी के पहाड़ के जंगल में योगाभ्यास करता रहा।  जब मेला हो चुका तब हृषिकेश में जाके संन्यासियों और योगियों से योग की रीति सीखना और सत्संग करता रहा।।

और बहुत से योगियों और विद्वान महन्तों और साधुओं से भेंट हुई और उनसे वार्तालाप में मुझको योग विद्या सम्बन्धी और बहुत नई बातें ज्ञात हुईं।

उनसे पृथक होकर मैं पुनः बद्रीनारायण को गया।  विद्वान रावल जो उस समय उस मन्दिर का मुख्य महन्त था।  और मैं उसके साथ कई दिन तक रहा।  हम दोनों का परस्पर वेदों और दर्शनों पर बहुत वाद विवाद रहा।  जब उनसे मैंने पूछा कि इस परिस्थिति में कोई विद्वान और सच्चा योगी भी है या नहीं, तो उसने यह जताने में बड़ा शोक प्रकट किया कि इस समय इस परिस्थिति में कोई ऐसा योगी नहीं है।  परन्तु उसने बताया कि मैंने सुना है कि प्रायः ऐसे योगी इसी मन्दिर के देखने के लिए आया करते हैं।  उस समय मैंने यह दृड़ संकल्प कर लिया, कि समस्त देशों में और विशेषतः पर्वतीय स्थलों में अवश्य ऐसे पुरुषों का अनवेषण करूँगा।

 (डा. रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान कृत ‘महर्षि दयानन्द जीवन वृत और कृतित्व’ से साभार उदृत‌).

प्रस्तुत कर्ता – डॉ मधु सूदन व्यास उज्जैन

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