सत्य की खोज में- ऋषि दयानन्द का स्वलिखित जीवनवृत – तृतीय भाग

सत्य की खोज में- ऋषि दयानन्द का स्वलिखित जीवनवृत – तृतीय भाग

मैं स्वामी दयानन्द सरस्वती संक्षेप से अपना जन्म चरित्र लिखता हूँ।।

एक दिन सूर्योदय के होते ही मैं अपनी यात्रा पर चल पड़ा और पर्वत की उपत्यका में होता हुआ अलखनंदा नदी के तट पर जा पहुँचा।  मेरे मन में उस नदी के पार करने की किंचित इच्छा न थी।  क्योंकि मैंने उस नदी के दूसरी और एक बड़ा ग्राम माना नामक देखा अतः अभी उस पर्वत की उपत्यका में ही अपनी गति रख कर नदी के वेग के साथ साथ मैं जंगल की और हो लिया।  पर्वत मार्ग और टीले आदि सब हिम के वस्त्र पहने हुए थे।  और बहुत घनी हिम उनके ऊपर थी।  अतः अलखनन्दा नदी के स्त्रोत पहुँचने में मुझको अत्यन्त कष्ट उठाने पड़े।  परन्तु जब मैं वहां गया तो अपने आप को सर्वथा अपरिचित और अजान जाना।  और अपने चारों और ऊँची ऊँची पहाड़ियां देखीं तो मुझे आगे जाने का मार्ग बन्द दिखाई दिया।  कुछ ही काल पश्चात पथ सर्वथा लुप्त हो गया, और उस मार्ग का मुझको कोई पता न मिला।  उस समय मैं सोच वा चिन्ता में था कि क्या करना चाहिये अन्ततः अपना मार्ग अन्वेषण करने के अर्थ मैंने नदी को पार करने का दृड़ निश्चय कर लिया।  मेरे पहने हुए वस्त्र बहुत हल्के और थोड़े थे और शीत अत्यधिक था।  कुछ ही काल पश्चात शीत ऐसा अधिक हुआ कि उसका सहन करना असम्भव था।  क्षुधा और पिपासा ने जब मुझे अत्यन्त बाधित किया तो मैं एक हिम का टुकड़ा खाकर उसको बुझाने का विचार किया, परन्तु उससे किंचित् आराम वा संतुष्टि न हुई।  पुनः मैं नदी में उतर उसको पार करने लगा।

कतिपय स्थानोंपर नदी बड़ी गम्भीर थी और कहीं पानी बहुत कम था।  परन्तु एक हाथ या आधा गज से कम कहीं न था।  किन्तु विस्तार अर्थात पार में दस हाथ तक था अर्थात कहीं चार गज और कहीं से पाँच गज।  नदी हिम के छोटे और तिरछे टुकड़ों से भरी थी।  उन्होंने मेरे पाँव को अति घावयुक्त कर दिया सो मेरे नग्न पाँव से रक्त बहने लगा।  मेरे पाँव शीत के कारण नितान्त सन्न हो गये थे।  जिस कारण मैं बड़े बड़े घावों से भी कुछ काल तक अचेत रहा।  इस स्थान पर अतिशीत के कारण मुझ पर अचेतना सी छाने लगी।  यहाँ तक कि मैं अचेतन अवस्था में होकर हिम पर गिरने को था जब मुझे विदित हुआ कि यदि मैं यहाँ पर इसी प्रकार गिर गया तो पुनः यहाँ से उठना मेरे लिये अत्यन्त असम्भव और कठिन होगा।  एवं दौड़ धूप करके जैसे हुआ मैं प्रबल प्रयत्न करके वहाँ से कुशल मंगल पूर्वक निकला और नदी के दूसरी और जा पहुँचा।  वहाँ जाकर यद्यपि कुछ काल तक मेरी अवस्था ऐसी रही जो जीवन की अपेक्षा मृतवत् थी तथापि मैंने अपने शरीर के ऊपरी भाग को सर्वथा नंगा कर लिया और अपने समस्त वस्त्रों से जो मैंने पहने हुए थे जानु व पाँव तक जंघा को लपेट लिया।  और वहाँ पर मैं सर्वथा शक्तिहीन और घबराया हुआ आगे को हिल सकने और‌ चल सकने में अशक्त खड़ा हो गया।  इस प्रकार प्रतीक्षा में था कि कोई सहायता मिले जिससे मैं आगे को चलूँ।  परन्तु इस बात की कोई आशा न थी कि वह आवेगी कहाँ से ?

सहायता की आशा में था, परन्तु सर्वथा विवश था और जानता था कि कोई सहायता का स्थान दिखाई नहीं देता| अन्त को पुनः एक बार मैंने अपने चारों और दृष्टि की और अपने सम्मुख दो पहाड़ी पुरुषों को आते हुये देखा जो मेरे समीप आये और अपने काश सम्भ से (?) मुझको प्रणाम करके उन्होंने अपने साथ घर जाने के लिये मुझे बुलाया और कहा “आओ हम तुमको वहाँ खाने को भी देवेंगे। ” जब उन्होंने मेरे क्लेशों को सुना और मेरे वृत को श्रवण किया तो कहने लगे “हम तुमको सिद्धप‌त पर भी जो एक तीर्थस्थान है, पहुँचा देवेंगे। ” पर‌न्तु उनका मुझको यह सब कहना अच्छा प्रतीत न हुआ।  मैंने अस्वीकार किया और कहा ” महाराज शोक ! मैं आपकी यह सब कृपा स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि मुझमें चलने की किंचित शक्ति नहीं है। ” यद्यपि उन्होंने मुझको बहुत आग्रह पूर्वक बुलाया और आने के लिये अत्यधिक अनुरोध किया, तथापि मैं वहीं अपने पाँव जमाये खड़ा रहा और उनकी आज्ञा वा इच्छानुकूल मैं उनके पीछे चलने का साहस न कर सका।

मैंने उनसे कह दिया कि यहाँ से हिलने का प्रयत्न करने की अपेक्षा मैं मर जाना उत्तम समझता हूँ।  ऐसा कहकर मैंने उनकी बातों की और ध्यान करना भी बंद कर दिया अर्थात पुनः उनसे न सुना।  उस समय मेरे मन में विचार आता था कि उत्तम होता यदि मैं लौट जाता और अपने पाठ को स्थिर रखता इतने में यह दोनों सज्जन वहाँ से चले गये और कुछ ही काल में पर्वतों में लुप्त हो गये|

वहाँ जब मुझे शांति प्राप्त हुई तो मैं भी आगे को चला और कुछ काल वसुधारा (प्रसिद्ध तीर्थ‌ व यात्रा स्थान‌) पर विश्राम करके माना ग्राम के निकटवर्ती प्रदेश में होता हुआ उसी सांय लगभग आठ बजे बद्रीनारायण जा पहुँचा।  मुझे देखकर रावलजी और उनके साथी जो घबराये हुए थे,विस्मय‌ प्रकाश पूर्वक पूछने लगे – “आज सारा दिन तुम कहाँ रहे ?” तब मैंने सब वृतान्त क्रमबद्ध सुनाया।  उस रात्रि कुछ आहार करके जिससे मेरी शक्ति लौटती हुई जान पड़ी, मैं सो गया।

दूसरे दिन प्रातः शीघ्र ही उठा और रावल जी से आगे जाने की आज्ञा माँगी।  और अपनी यात्रा से लौटता हुआ रामपुर [फुट् नोट‌ – यहाँ ‘रामनगर’ नाम होना चाहिये। ] की और चल पड़ा।  उस सायं चलता चलता एक योगी के घर पहुँचा।  वह बड़ा तपस्वी था।  रात्रि उसी के घर काटी।  वह पुरुष जीवित ऋषि और साधुओं में उच्च कोटी का ऋषि होने का गौरव रखता था।  धार्मिक विषयों पर बहुत काल तक उसका मेरा वार्तालाप हुआ।  अपने संकल्पों को पहले से अधिक दृढ़ करके मैं आगामी दिन प्रातः उठते ही आगे को चल दिया।

(डा. रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान कृत ‘महर्षि दयानन्द जीवन वृत और कृतित्व’ से साभार उदृत‌).

प्रस्तुत कर्ता – डॉ मधु सूदन व्यास उज्जैन

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