सहस्र औदीच्य ब्राह्मण कोन?

सहस्र औदीच्य ब्राह्मण कोन ?

आर्यों की श्रुति, स्मृति, पुरणादि, संस्कृत ग्रन्थों के अनुसार सृष्टि के आरंभ में सर्व प्रथम ब्रह्मा उत्पन्न हुए। उनके द्वारा जो प्रथम प्रजा उत्पन्न हुई वह ब्राह्मण कही गई। इसके पश्चात जैसे जैसे मनुष्यों की आबादी बढ़ती गई, उनके गुण ओर कर्म के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र ये चार जाती भेद, या वर्ण बने।

 ब्राह्मण प्रारम्भ में  हिमालय क्षेत्र के उत्तरी भाग में बसे, फिर क्रमश: भारत भूमि के उत्तर हिमालय की तलहटी, सिंधु, व गंगा के मैदान, ब्रह्मावर्त में शरावती (सरस्वती) नदी के किनारे बसे। इस नदी के उत्तर तट पर बसने वाले प्राच्य कहलाए।

    पाणिनी मुनि ने अपने “सिद्धांत कौमुदी” व्याकरण रचना में उस काल में  “उदीच्य” एवं “प्राच्य” केवल दो विभाग ही बताएं हें।  उनके इस व्याकरण ग्रंथ से ज्ञात होता है, “उदीच्या: प्राचेभ्य: पठुत्तरा:” अर्थात उदीच्य प्राच्य की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ थे।

     दोनों विभाग की वंशवृद्धि से कालांतर में अनेक समूह काशी, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, सिद्धक्षेत्र, पुष्कर, आदि पवित्र तीर्थों में बस गए। इसके ही कुछ काल के पश्चात आदिगुरु श्रीमद शंकरचार्य जी के काल में उदीच्य में से पञ्च द्रविड़, व प्राच्य में से पञ्च गौड़ इस तरह से कुल दस विभागहो गए। वर्तमान में गुजरात के पञ्च-द्रविड़ में से 84 से भी अधिक विभाग होकर अलग अलग ब्राह्मण जातियाँ बन गई, परंतु उदीच्य ब्राह्मणो ने स्वयं को इसी उदीच्य ब्राह्मण का नाम बनाए रखा।

   गुजरात राज्य में सरस्वती नदी के उत्तर पश्चिम तट महाराज मनु के काल से ही श्रीस्थल तीर्थ जिसका उल्लेख पुराणादी में भी आया हे, श्रेष्ठ तीर्थ माना जाता रहा है। यहाँ प्राचीन काल से ही  आर्य धर्म के पालन कर्ता, क्षत्रिय राजा स्नान, दान, आदि द्वारा अपने दुष्कृत्यों का प्रायश्चित करने आया करते थे। इसी परपम्परा में पाटण के महाराज मूलदेव सौलंकी यहाँ आया था। उसके पूछने पर वहाँ के तत्कालीन ब्राह्मणो ने सुझाव दिया की हमारी अपेक्षा उत्तर में अधिक विद्वान और श्रेष्ठ ब्राह्मण तपस्वी अनेक तीर्थों में हें। आप उन्हे आमंत्रित कर प्रायश्चित करें तो आपका मनोरथ सिद्ध होगा।

    दसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सन 950 के आसपास सहस्र औदीच्य ब्राह्मणो  नाम करण का सूत्रपात हुआ था। महाराजा मूलराज सौलंकी ने पाप के प्रायश्चित हेतु, कोडिन्य ऋषि की सलाह से महाराज मूलराज ने उदीच दिशा के 1037 ब्राह्मण निमंत्रण देकर बुलवाए। ये ही ब्राह्मण “सहस्र औदीच्य ब्राह्मण” के नाम से विख्यात हुए।

   इन 1037 आमंत्रित विद्वान ऋषि ब्राह्मणणौ में से, गंगा यमुना के संगम प्रयाग तीर्थ से 105, च्यवन ऋषि आश्रम से 100, सरयू नदी के तट पर बसे 100 वैद शास्त्री, कन्याकुब्ज या कन्नोज क्षेत्र से 200, काशी से 100, कुरुक्षेत्र से 100 यजुर्वेदी, हरिद्वार या गंगद्वार से 100 ऋग्वेदी, नेमिषारण्य से 100 ऋग्वेदी, और पुष्कर क्षेत्र से 132, ऋग्वेदी, ब्राह्मण आमंत्रित होकर आए।

   यह संख्या सहस्र (हजार) होने से और उत्तर दिशा के उदीच्य होने से कालांतर में “सहस्र औदीच्य” नाम से विख्यात हुए। अन्य समस्त उत्तर भारतीय या उदीच्य ब्राह्मण कालांतर में विस्तार पाकर अपने अपने निवास क्षेर्त्रो , जैसे कान्यकुब्ज, सरूयूपारीय, पुष्करणा, आदि-आदि कहे जाने लगे।

    इस काल में आवागमन के साधन वर्तमान की तरह तीव्र गामी न होने और मार्ग भी अविकिसित होने से सामाजिक और वैवाहिक संबंध, आदि आसान पुहुंच क्षेत्रों में सम्पन्न होते रहने से वर्तमान की बहु ब्राह्मण व्यवस्था दृष्टिगोचर होती है।

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