सहस्र औदीच्य ब्राह्मणो में से सिद्धपुरी,सिहोरी या टोलकीया समवाय आदि का विस्तार।

सहस्र औदीच्य ब्राह्मण कोन? (पूर्व लेख से आगे)

उदीच्य या उत्तर दिशा से 1037 ब्राह्मणों को पाटन के महाराज मूलराज सोलंकी ने ऋषि कोडिन्य के परामर्श से अपने पाप के प्रायश्चित करने हेतु गुजरात आमंत्रित किया था।  इन एक हजार सेंतीस विद्वान ब्राह्मणो को विधि और यज्ञादी के पश्चात पूजन कर आभूषण वस्त्र, भूमि, भवन स्वर्णादी दान देना, चाहा था। शास्त्रों के अनुसार धन लेना, अनुचित माना जाता था। अत: इसे सभी ने अस्वीकार कर दिया।

      राजा चिंतित हो गया, क्योंकि यज्ञादी का पूर्ण फल प्राप्त करने दान दिया जाना आवश्यक था। श्रीस्थल पुराण और ब्राह्मण उत्पत्ति मार्तंड आदि ग्रंथो के अनुसार, जब ऋषि ब्राह्मण कार्तिक शुक्ल एकादशी से प्रारम्भ होने वाले भीष्म पंचक के अवसर पर, अपनी अपनी पत्नियों को उनकी पर्ण-शालाओं में छोड़कर दधीचि मुनि के आश्रम में तप आदि विधि करने के उदेश्य से चले गए तव अवसर पाकर राजा मूलराज की पटरानी दान देने का अभीष्ट लेकर, स्वर्ण, रत्न, जड़ित आभूषणो के साथ सरस्वती तट पर  ऋषि पत्नियों के समीप पहुँच कर स्नानदी करने लगीं। रानी की सुंदरता, और स्नान पूजन के लिए उनके समीप के तट पर आने की बात सुनकर, जिज्ञासा वश ऋषि पत्नियाँ वहाँ एकत्र हो गई। अवसर जान रानी ने ऋषि पत्नियों को स्वागत, पूजन अर्चन किया, और हाथ जोड़कर निवेदन किया की ये वस्त्र, आभूषण दान हेतु हें, आपको जो भी रुचिकर लगे, आप स्वीकार करें। प्रथम एक ऋषि पत्नी ने लेने की इच्छा की, इस पर रानी ने उसे श्रेष्ठ तं वस्त्र ओर आभूषणो से उसे अलकृत कर दिया। देखादेखी अन्य ऋषि पत्नियों की भी प्राप्त करने की इच्छा होने लगी, रानी ने सभी को और मँगवा मँगवा कर अगले पांचों दिन तक ऋषि पत्नियों को विभिन्न वस्त्रालंकारों से विभूषित कर दिया।

    भीष्म पंचक की अवधि पूर्णकर जब ऋषि अपने आश्रमों में लोटे, तो यह सब देखकर क्रोधित होने लगे। ऋषि पत्नियों ने अपने अपराध की क्षमा मांगते हुए, रानी के स्नान-पूजन के पश्चात ऋषि पत्नी पूजन करने की बात बताई, और कहा की वे रानी के इस आग्रह को वे अस्वीकार न कर सकीं।  समस्त ऋषि पत्नियों के इस सामुहिक भेंट स्वीकार कर लेने पर ऋषि गण भी उन्हे क्षमा करने के लिए बाध्य हो गए।

   रानी से ऋषि पत्नियों के दान ले लेने पर महाराज मूलराज ब्राह्मणो की सभा में जाकर आदर पूर्वक दंडवत हो ऋषि ब्राह्मणो से निवेदन करने लगा के “हे भू देवो, यह श्रीस्थल सभी मानवों के पापों को मुक्त करने वाला है, में भी पाप से मुक्त होना चाहता हूँ, आप बताएं कैसे किस रीति से दान कर में मुक्ति प्राप्त करूँ।”

   राजा के नतमस्तक विनम्र आग्रह पर द्रवित हुए ऋषि ब्राह्मणो ने यज्ञ का आरंभ कर दिया, और यज्ञ पश्चात विविध भांति दान किया। पहिले 500 ब्राह्मणो में से 21 को सिद्धपुर (श्रीस्थल) दान कर शेष 479 को 170 ग्रामों का दान किया। इन्ही पाँच सौ के समूह को सिद्धपुर संप्रदाय का कहा गया। शेष में से पाँच सो ब्राह्मणो से दस को सिहपुर(सीहोर) नगर और शेष को अन्य समीपस्थ ग्रामो का दान किया, ये पाँच सभी सौ सीहोर संप्रदाय के नाम से जाने गए। ये सभी एक हजार ब्राह्मण (सिद्धपुर और सीहोर संप्रदाय वाले) सहस्रोदीच्य नाम से जाने गए।

    शेष रहे 37 (सेंतीस) ब्राह्मणों ने जो अलग टोली बनाकर बैठ थे, उन्हे खंभात नगर, और उसके समीपवर्ती क्षेत्र के 14 ग्रामो का दान किया, इस हेतु वे टोलकिया संप्रदाय के नाम से विख्यात हुए।

    उपरोक्त यह वर्णन “श्रीस्थल प्रकाश”  जो की एक आदि संस्कृत ग्रंथ हें, से लिया गया है। ब्राह्मण उत्पाती मार्तंड, आदि अनेक ग्रन्थों का भी यही “श्रीस्थल प्रकाश” मूल स्त्रोत है।

     आगे क्रमश:-   कहाँ से आयें ये छोटी बड़ी संभा या समवाय?

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