अ.भा. औदीच्‍य महासभा के सम्‍पन्‍न हुए अधिवेशनों की जानकारी

– उद्धव जोशी, उज्जैन ( uddhavjoshi1946@gmail.com)

प्रारम्भ में सहस्त्र औदीच्य समाज, अखिल भारतीय औदीच्य ब्रहम समाज, अ.भा.सहस्त्रोदीच्य महासभा, गुर्जर हितैषी सभा जैसे अनेकानेक संगठनों के माध्यम समाज में अपनी गतिविधि चला रहे थे।  वर्ष 1903 में अ.भा.औदीच्य महासभा का नामकरण किया गया किन्तु पूरे भारतवर्ष के औदीच्य ब्रहम समाज का इसमें संविलियन नहीं होने के कारण अ.भा.सहस्त्रोदीच्य महासभा के साथ साथ महासभा के अधिवेशन होते रहे । लगभग आठ दस अधिवेशनों में सभी प्रान्तों के बन्धु भाग लेने आ रहे थे। इस कारण  जयपुर में सन् 1948 में सम्पन्न हुए दशम अधिवेशन में सहस्त्रोदीच्य महासभा को अ.भा.औदीच्य महासभा का स्वरूप प्रदान किया गया तथा सनु 1951 में बडनगर में आयोजित एकादश अधिवेशन में  विस्तृत विधान बनाया गया तथा यहीं से इसे अखिल भारतीय स्वरूप प्राप्त हुआ।
अ.भा.औदीच्य महासभा के संविधान का पंजीकरण क्रमांक एस 631/53-54 होकर दिनांक 9/4/2014 को इसे कुछ संशोधन के साथ रजिस्टार आफ सोसायटी, गव्र्हमेन्ट आफ एनसीटी देहली व्दारा पुनः पारित करवाया गया ! महासभा के संविधान की धारा ग्यारह के अनुसार एक कार्यकारिणी के सम्पूर्ण कार्यकाल में कम से कम एक अधिवेशन या महाअधिवेशन आयोजित करना चाहिए! इसमें देश भर की सभी इकाईयां,सभी श्रेणी के सदस्य,स्वयं को औदीच्य मानने वाले बन्धु अथवा सम्बद्ध या सहयोगी संस्थाओं को भी भाग लेने की अनुमति रहेगी, अधिवेशन में भाग लेने वालों को निर्धारित प्रतिनिधि शुल्क देना होग।
आईए अब हम अ.भा.औदीच्य महासभा व्दारा आयोजित 19 अधिवेशनों एवं उनमें पारित प्रस्तावों की
जानकारी और निर्णीत प्रस्तावों पर कितना अमल हुआ उसे जाने !
प्रथम अधिवेशन:-
दिनांक 19/20/21/4/1904 को  मथुरा में अ.भा. औदीच्य महासभा का प्रथम अधिवेशन  औदीच्य ब्रहम समाज के छठवे अधिवेशन के साथ सम्पन्न हुआ ! इस अधिवेशन में समाज के आचार विचार व्यवहार संस्कारों के संबंध में चर्चा हुई !
व्दितीय अधिवेशन:-
मई 1925 में  महासभा का व्दितीय अधिवेशन ग्वालियर में  आहूत किया गया। इस अधिवेशन में मातृभाषा एवं संस्कारों के रक्षण ,बाल विवाह एवं कन्या विक्रय निषेध  जैसे विषयों पर प्रस्ताव पारित हुए ।  इसके साथ ही ये प्रस्ताव भी आये की उदयपुर पंजाब,84 परगना, मालवा आदि प्रान्तों के छोटे बडे समुदायों के औदीच्य बन्धुओं के साथ भोजन एवं कन्या व्यवहार स्थापित करने के साथ  औदीच्यों की उन्नति के लिए ब्रहमचर्याश्रम,विधवाश्रम तथा विद्यालय आदि के लिए एक स्थायी कोष स्थापित किया जावे !
तृतीय अधिवेशन:-
महासभा का तृतीय अधिवेशन जून 1927 में पं.चम्पालाल जी त्रिपाठी के सभापतित्व में  काशी बनारस में सम्पन्न हुआ। इसमें भी व्दितीय अधिवेशन में पारित प्रस्तावों  पर ही फिर से विचार विमर्श करने के साथ ही सस्कार शुध्दि पर बल दिया गया ! बनारस में बहमचर्याश्रम खोलने का प्रस्ताव भी पारित किया गया !
चतुर्थ अधिवेशन:-
महासभा का चतुर्थ अधिवेशन सन 1928 पं. रघुनाथ जी के सभापतित्व में  माधोपुर में सम्पन्न हुआ ! मालवा तथा 84 परगने  के प्रतिनिधि इस अधिवेशन में पहली बार उपस्थित हुए थे ! इस अधिवेशन में प्रस्तावों की भरमार नहीं थी किन्तु औदीच्य ब्राहमणों का अधिकृत इतिहास बनाने,जयपुर में औदीच्य छात्रावास बनाने  तथा बागड एवं मालव प्रांत में प्रचार करने संबंधी प्रस्तावों पर जोर दिया गया !
पंचम अधिवेशन:-
महासभा का पंचम अधिवेशन 1930 में मथुरा में सम्पन्न हुआ ! इस अधिवेशन में मालवा तथा 84 परगना से बडी संख्या में प्रतिनिधि आये थे । इस अधिवेशन में महासभा के सदस्यों की वृध्दि ,खर्च कम करने एवं कुरीतियां  बंद करने आदि विषयों पर प्रस्ताव स्वीकृत हुए ।
षष्टम अधिवेशन:-
अ.भा.औदीच्य महासभा का छठा अधिवेशन  दिनांक  19,20,21,22 अप्रेल 1935 को श्री कन्हैयालाल जी उपाध्याय के सभापतित्व में  परम पवित्र तीर्थ नगरी पुष्कर में सम्पन्न हुआ । इसमें उपजातियों के एकीकरण,अनावश्यक प्रदर्शन,बेकारी दूर करने  के लिए उद्योग धन्धों की उन्नति,महासभा  की कार्यवाही हिन्दी में प्रकाशित करने,औदीच्य बन्धु की आर्थिक स्थिति सुद्रढ करने ,पुत्र का विवाह 18 वर्ष के पूर्व नहीं करना,सध्या करना,समाज सेवा के साथ ही मृत्यु भोज  शास्त्रानुसार  एवं यथाशक्ति ही हो ! आदि प्रस्तावों पर विचार होकर स्वीकृति की मोहर लगी ।
सप्तम अधिवेशन:-
 1 जून 1936 को काशी में महासभा का सप्तम अधिवेशन श्री गौरीशंकर जी शास्त्री के सभापतित्व में सम्पन्न हुआ ! काशी में औदीच्य भवन की स्थापना तथा भगवान गोविंद माधव का मंदिर बनाने हेतु प्रबंध कार्यकारिणी समिति का गठन किया गया !  महासभा के उददश्यों का प्रचार करने ,औदीच्य बन्धु की ग्राहक संख्या बढाने हेतु परिभ्रमण के लिए मंडल बनाया गया। महासभा के आजीवन आश्रयदाता,आजीवन सदस्य,वार्षिक सदस्य एवं साधारण सदस्य बनाने संबंधी प्रस्ताव भी स्वीकृत किया गया ।
अष्ठम अधिवेशन:-
 अ.भा.औदीच्य महासभा का अष्ठम अधिवेशन  पं. गोविन्द वल्लभ जी शास्त्री की अध्यक्षता में मथुरा में सम्पन्न हुआ ! इसमें भी पूर्वानुसार ही सामाजिक हितों के विषयों पर चर्चा होकर प्रस्ताव पारित किए  गए !
नवम अधिवेशन:-
महासभा का 9वा अधिवेशन 24,25,26 मई 1941 को पूज्य श्रीलाल जी सा. पण्ड्या के सभापतित्व में भूसावल में सम्पन्न हुआ । इस अधिवेशन में अन्र्तप्रान्तिय भेदभाव समाप्त करने  तथा महासभा  को अधिक कार्यक्षम,व्यापक तथा गतिशील बनाने हेतु प्रस्ताव स्वीकृत किए गये । सभी नगरों तथा क्षेत्रों में महासभा की शाखायें स्थापित करने पर जोर दिया गया । 10 से अधिक प्रस्ताव स्वीकृत हुए ।
दशम अधिवेशनः-
महासभा का दसवां अधिवेशन डाॅ.नारायण दुलीचंद जी व्यास की अध्यक्षता में  जयपुर में सम्पन्न हुआ ! इसमें ‘‘सहस्त्रोदीच्य महासभा‘‘ को सन 1948 में अखिल भारतीय औदीच्य महासभा का  स्वरूप प्रदान किया गया क्यों कि महासभा के अब तक के सम्पन्न हुए अधिवेशनों में  सभी प्रान्तों के बन्धु भाग लेने आये थे ।
एकादश अधिवेशन:-
महासभा का अधिवेशन सन 1951 में पं. राधेध्याम जी  व्दिवेदी जी की अध्यक्षता में बडनगर जिला उज्जैन में सम्पन्न हुआ ! इसमें  बहुत बडी संख्या में पंजाब,दिल्ली,उत्तरप्रदेश,राजस्थान,निमाड,मालवा,मेवाड,बागड आदि स्थानों के प्रतिनिधि उपस्थित हुए थे । इसमें  महासभा के विशाल स्वरूप का विस्तृत विधान  बनाकर प्रस्तुत किया गया और यही से अखिल भारतीय  स्वरूप प्राप्त हुआ ! इस अधिवेशन में महासभा की शुध्द संगठन भावना एवं बिना किसी स्पर्धा के ज्ञाति संगठन विषयक कत्र्तव्य परायणता देखकर यह विश्वास हो गया कि  महासभा ब्रहम समाज के प्रति पूर्ण श्रध्दा भावना रखते हुए कार्य कर रही है!
बडनगर में महासभा के अधिवेशन के रूप में ज्ञाति बन्धुओं का यह समारोह  ‘‘ मालवा प्रान्तीय औदीच्य सम्मेलन के 42 वर्षो पश्चात हो रहा था ! इस कारण नई पीढी के लोगों में उत्साह था साथ ही अन्य सम्मेलनों की भांति यह अधिवेशन केवल प्रस्ताव पास करके ही  रह जाने वाला नहीं था! अतः इसके साथ ही गायात्री पुरश्चरण  महायज्ञ एवं 40 औदीच्य बालकों का सामूहिक यज्ञोपवित संस्कार भी  महासभा की और से कराया गया !  इसी अवसर पर ‘‘ औदीच्य छात्रावास‘‘ का मुहुर्त भा जाति के ही एक पुरातन भवन में कराया गया था ! साथ ही महिला सम्मेलन के रूप में जाति की महिलाओ का समाज सेवा के लिए अग्रसर होना विशेष उल्लेखनीय था !
इस अधिवेशन में महासभा को व्यापक रूप से कार्यक्षम बनाने के लिए सुद्रढ एवं सक्षम कार्य समिति का गठन करके आगे के लिए रचनात्मक कार्यक्रम भी निश्चित किए गए।इसी प्रकार महासभा का कार्यालय दिल्ली से उज्जैन लाकर उसे चलाने की सेवा सौंपी गई! इस सब कारणों से मालवा के ज्ञाति समाज में विशेष जाग्रति और उत्साह का संचार होता रहा ।
व्दादश अधिवेशन:-
बडनगर में हुए अधिवेश्न के तीन वर्ष पश्चात ही सन् 1955 में महासभा के बारहवे अधिवेशन देवास में श्री पं. त्रिभुवनदास जी मंगल जी व्यास की अध्यक्षता में हुआ । इस आयोजन के प्रमुख सूत्रधार श्री पं. मोतीलाल जी मोदी वकील सा. तथा कोल्हूखेडी ग्राम के प्रसिध्द भूमिपति पं. अमरसिंह जी चुन्नीलाल जी जोशी थे । इस सम्मेलन में  गायत्री यज्ञ, 12 औदीच्य बालकों का यज्ञोपवित संस्कार तथा महिला सम्मेलन आदि सम्पन्न हुए।
त्रयोदश अधिवेशन:-
महासभा का तेरहवां अधिवेशन ज्येष्ठ कृष्ण 2-3-4- सवंत 2014 को गुजराती समाज के भवन मेंपं.श्री तुलजाशंकर जी दवे के सभापतित्व में सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन में गुजरात, सौराष्ट, बागड, मालवा, निमाड, राजस्थान, मेवाड, सिरोही, उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्यप्रदेश, बिहार, बंगाल आदि सभा प्रान्तों के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर सिध्द कर दिया कि वे इस जाति रूपी अनुष्ठान में भाग लेने के लिए तन मन धन से प्रस्तुत हैं । यह अधिवेशन तीन दिन तक चला। इसमें युवा,महिला सम्मेलन,प्रदर्शनी,मनोरंजक संवाद एवं निबन्ध आदि के साथ 29 बटुकों का यज्ञोपवित संस्कार भी हुआ।
इस भव्य सम्मेलन में श्री पं. मुकुन्दराम जी त्रिवेदी ने अपनी चिरकालीन अभिलाषा की पूर्ति  के लिए इन्दौर नगर में औदीच्य विद्यार्थी भवन स्थापित करने  के लिए रू.21000/- दान किए ! साथ ही पूर्व निश्चित संकल्प के अनुसार प्राप्त होने वाली भूमि मूल्य भी देने की घोषणा की । अन्यान्य कार्यक्रमों के साथ संयुक्त एवं सम्पक्त ज्ञाति भोजन का विशाल एवं सफल आयोजन भी महासभा के इतिहास में एक उल्लेखनीय घटना कही जा सकती है। बडनगर, देवास और इन्दौर  के सम्मेलनों की सफलता एवं जातीय संगठन की भावना के फलस्वरूप अन्र्तप्रान्तीय विवाहों का भी श्री गणेश हो गया । इसी प्रकार इन्दौर में  जुलाई 1958 से छात्रावास भी प्रारम्भ कर दिया गया।
चर्तुदशाधिवेशनः-
अ.भा.औदीच्य महासभा का 14वां अधिवेशन दिनांक 8-9/6/1963 को बडनगर श्री मुकुन्दराम जी सा. त्रिवेदी के सभापतित्व में सम्पन्न हुआ । परम्परानुसार इस अधिवेशन में 18 बटूकों का यज्ञोपवित संस्कार हुआ ! विभिन्न सामाजिक समस्याओं एवं कुरीति उन्मूलन के साथ महासभा के विस्तार और औदीच्य बन्धु की सदस्य संख्या बढाने पर विचार विमर्श किया गया ।
पंचदशाधिवेशन –
महासभा का 15वा अधिवेशन 9-10-11/6/1967 को औदीच्य धर्मशाला उज्जैन में श्री मोतीलाल जी दवे की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ । यज्ञ हवन के साथ 33 बटुकों का यज्ञोपवित संस्कार हुआ ! युवा,महिला सम्मेलन के साथ ही कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की जाकर प्रस्ताव पारित किए गए !
षष्ठदश  अधिवेशन :-
महासभा का 16 वा अधिवेश 13/14/15 जून 1970 को रतलामश्र श्री देवीशंकर जी तिवाडी की अध्यक्षता  में सम्पन्न हुआ ! इस अधिवेशन में मुख्य रूप से निम्न प्रस्ताव पारित हुए । 1- औदीच्य बन्धु के लिए स्थाई कोष की स्थापना 2-संविधान की धारा 10 के अनुसार प्रत्येक प्रांत एवं नगर में  महासभा की शाखायें खोली जावे । 3-प्रति वर्ष हर राज्य में सामूहिक यज्ञोपवीत के कार्यक्रम हो ! 4-प्रत्येक राज्य में जाति की जन गणना और सर्वेक्षण कार्य हो !
सप्तदश अधिवेशन:-
17 वां अधिवेशन 21-22 अक्टूम्बर 1972 को  कोटा राज. के बडे देवता श्री श्रीधरलाल जी की अध्यक्षता में  जयपुर में  सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन में वर्तमान युग के अनुरूप नीति निर्धारण करते हुए विधान में आवश्यक संशोधन के साथ समस्त औदीच्यों की एकता एवं आर्थिक उन्नति हेतु ठोस एवं व्यावहारिक आधारों पर जोर दिया गया । युवक एवं महिला सम्मेलन भी हुए ! हस्तशील्प एवं चित्रकला प्रदर्शनी आकर्षण का केन्द्र थी !
अष्टदश अधिवेशन:- 
महासभा का अठारवां अधिवेशन 27/28/29 मई 1982 को उदयपुर में श्री विष्णुदत्त जी व्यास की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ । इसमें गायत्री यज्ञ एवं सामूहिक यज्ञोपवित के साथ  युवा एवं महिला सम्मेलन होकर कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर चर्चा कर निर्णय लिए गए, इसके बाद अ.भा.औदीच्य महासभा अध्यक्ष वर्ष 1986 में श्री लज्जाशंकर जी आचार्य, वर्ष 1990 में न्यायमूर्ति श्री वीरेन्द्रदत्त जी ज्ञानी  वर्ष 1993 में सासद डाॅ.लक्ष्मीनारायण जी पाण्डे अध्यक्ष चुने गये किन्तु वर्ष 1992 से 2005 तक कोई अधिवेशन आयोजित नहीं किया गया।
उन्नीसवां अधिेवेशन:- 
दिनांक 4-5 जून 2005 को श्री रामचन्द्र पांडे की अध्यक्षता में उन्नीसवां  अधिवेशन सम्पन्न हुआ ! महासभा के 100 पूर्ण होने पर शताब्दी अधिवेशन के रूप में विशाल आयोजन करते हुए एक स्मारिका ‘‘ स्मृति‘‘ भी प्रकाशित की गई ! इस अधिवेशन में समाज के विशिष्ठ,वरिष्ठ,विव्दान सदस्यों व्दारा समाजोन्नति के लिए अपनी विचारों की सुन्दर पुष्पमाला पिरो कर श्रोता वर्ग को प्रदान की ! युवा और महिला सम्मेलन भी पृथक से होकर युवाओं को रोजगार देने ,समाज की प्रतिभाओं को आगे बढाने,समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने, कन्या भ्रुण हत्या को रोकने, बालिकाओं की शिक्षा जैसे अनेक विषयों पर अपने बेबाक विचार रखें ! कई प्रस्ताव पारित हुवे किन्तु पूर्व के अधिवेशनों के अनुसार ही ये प्रस्ताव भी प्रस्ताव पंजीयों में सिमट कर रह गये ।
विशेष कर इस अधिवेशन में महासभा व्दारा  समाज की तीन विभूतियों स्व.श्री.भेरूलाल जी पटेल सा. की स्मृति में  ‘‘समाज सेवा पुरस्कार‘‘, राष्टीय कवि स्व.श्री प्रदीप जी की स्मृति में ‘‘साहित्यिक पुरस्कार ‘‘एवं शहीद श्री बलराम जोशी की स्मृति में  ‘‘शौर्य पुरस्कार ‘‘प्रतिवर्ष देने की घोषणा की गई थी । जो आज तक घोषणा बन कर ही नस्तीबध्द है। नहीं दिये गये। अ.भा.औदीच्य महासभा के गठन से लेकर आज तक 19 अधिवेशन सम्पन्न होकर, उनमें अनेकानेक प्रस्ताव पारित हुवे किन्तु उन प्रस्तावों का वास्तविक रूप से धरातल पर कार्यरूप में परिणित न होना एक महत्वपूर्ण विचारणीय विषय है।

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