सहस्र औदीच्य ब्राह्मण

  • सहस्र औदीच्य ब्राह्मणों के इष्ट  “भगवान् गोविन्द माधव” सिध्द पुर ग्राम के गामधणी” (मुखिया)   मोर्य काल की हें, श्वेत मार्बल से निर्मित गोविंद-माधव की मूर्तियाँ!
  • सहस्र औदीच्य ब्राह्मण  कोन ?    आर्यों की श्रुति, स्मृति, पुरणादि, संस्कृत ग्रन्थों के अनुसार सृष्टि के आरंभ में सर्व प्रथम ब्रह्मा उत्पन्न हुए। उनके द्वारा जो प्रथम प्रजा उत्पन्न हुई वह ब्राह्मण कही गई। इसके पश्चात जैसे जैसे मनुष्यों की आबादी बढ़ती गई, उनके गुण ओर कर्म के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र ये चार जाती भेद, या वर्ण बने।    ब्राह्मण प्रारम्भ में  हिमालय क्षेत्र के उत्तरी भाग में बसे, फिर क्रमश: भारत भूमि के उत्तर हिमालय की तलहटी, सिंधु, व गंगा के मैदान, ब्रह्मावर्त में शरावती (सरस्वती) नदी के किनारे बसे। इस नदी के उत्तर तट पर बसने वाले— अधिक देखें -सहस्र औदीच्य ब्राह्मण  कोन ?
  • हमारा चित्रमय इतिहास एक नजर में – [wp-booklet id=1035]
  •  सहस्र औदीच्य ब्राह्मणो में से सिद्धपुरी, सिहोरी या टोलकीया समवाय आदि का विस्तार।  —   उदीच्य या उत्तर दिशा से 1037 ब्राह्मणों को पाटन के महाराज मूलराज सोलंकी ने ऋषि कोडिन्य के परामर्श से अपने पाप के प्रायश्चित करने हेतु गुजरात आमंत्रित किया था।  इन एक हजार सेंतीस विद्वान ब्राह्मणो को विधि और यज्ञादी के पश्चात पूजन कर आभूषण वस्त्र, भूमि, भवन स्वर्णादी दान देना, चाहा था। शास्त्रों के अनुसार धन लेना, अनुचित माना जाता था। अत: इसे सभी ने अस्वीकार कर दिया-  राजा चिंतित हो गया, क्योंकि यज्ञादी का पूर्ण फल प्राप्त करने दान दिया जाना आवश्यक था। देखें- सहस्र औदीच्य ब्राह्मणो में से सिद्धपुरी, सिहोरी या टोलकीया समवाय आदि का विस्तार।
  • औदीच्य ब्राह्मण समाज ब्रिटिश इतिहासज्ञ श्री रेवरेण्‍ड एम ए शेरिेंग की नजर से|-ब्रिटिश समाज शास्त्री एवं इतिहासज्ञ श्री रेवरेण्‍ड एम ए शेरिेंग  व्‍दारा लन्‍दन से सन 1872 में  लिखित ग्रन्‍थ  ‘‘हिन्‍दू ट्राईब्‍स एंड कास्‍टस एस रिप्रजेण्‍टेड इन बनारस‘ जिसका प्रकाशन दो खण्‍डों में हुआ था, ने बनारस को मुख्‍यालय बनाकर तथा भ्रमण कर देश के सभी क्षेत्रों में आबाद हिन्‍दुओं की समस्‍त जातियों और उनके रीति रिवाज के संबंध में न केवल अध्‍ययन किया वरन विस्‍त्रत जानकारी संकलित की थी ।  भारत में ब्राहमणों की कितनी जातियां है?  यह सदैव ही जिज्ञासा का विषय रहा है। इस जिज्ञासा का समाधान रेवरेंड शेरिंग ने उस काल में पहली बार करने का प्रयास किया। उन्‍होने इस ग्रन्‍थ् में ब्राहमणों की लगभग दो हजार जातियों का वर्णन किया है। देखें –औदीच्य ब्राह्मण समाज ब्रिटिश इतिहासज्ञ श्री रेवरेण्‍ड एम ए शेरिेंग की नजर से|-|

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(सहस्र औदिच्य ब्राह्मणो में ही टोलकीय, छोटी या बड़ी (नानी या मोटी ,) संभा या समवाय, आदि कैसे बनी?)

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