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Uddhav Joshi – AudichyaBandhu.org http://audichyabandhu.org Audichya Samaj Online Portal... Mon, 04 Sep 2017 09:50:16 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=5.3.2  मन को कैसे मनावें http://audichyabandhu.org/man-ko-kaise-manave/ Tue, 04 Oct 2016 07:36:22 +0000 http://audichyabandhu.org/?p=2075 आम धारणा है कि मन मानता ही नहीं है? मन इतना बेलगाम क्यों है? मन को कैसे मनायें? मन को वश में करने के लिये हजारो किताबी नुस्खे बाजार मे उपलब्ध है । अध्यात्म,योग,मनोविज्ञान, शास्त्र आदि के विव्दानों एवं विशेषज्ञों ने भी मन को मनाने के कईं सरल उपाय खोजे हैं किन्तु मन तो मन है । इस 5-6फुट के शरीर में मन, बुध्दि, दिल, दिमाग जैसे कई महत्वपूर्ण अंग हैं किन्तु सबसे ज्यादा मन ही चर्चा में रहता है । बच्चों से कहा जाता है कि मन लगाकर पढा करों। अपनों से मन मैला न करों । गोपनीय इतना की किसी के मन में क्या चल रहा है,पता ही नही ,कब किस पर मन आ जाये? आदि आदि । मन के बारे में बहुत शोधपूर्ण लिखा भी गया है।
कहा जाता है कि मन को वश में रखो,टेन्शन मत पालो,सकारात्मक सोचों। इसके प्रतिउत्तर में लोगों का कहना है कि ऐसा करना असंभव है। वर्तमान समय में हर पल तनाव दे रहा है । यहाँ हमें इतनी बात समझना होगी की मन की मनमानी ,नकारात्मक सोचने की क्रिया और टेन्शन पालने की प्रक्रिया जैसी कमजोर कडी ने तो मनुष्य को मजबुती से बांध रखा है । इस कमजोर कडी को मजबूत कडी में अन्तरित करना भी हमारे बस में है तो क्यों न सकारात्मक सोंच का श्रीेगणेश करें । इस मंहगाई के युग में सकारात्मक जीवनी शक्ति यदि हमें निशुल्क मिल रही है तो क्यों न उसका उपयोग करें।
मन के बारे में भी गहराई तक जाने की कोई आवश्यकता नहीं है । मन की दो धारायें हैं। वह या तो वश में रहेगा या भटकेगा । यदि भटकेगा तो आवारा बादल की तरह निरर्थक और अनुपयोगी होकर घूमता रहेगा। यदि मन वश में रहा तो कमाल के काम दिखा सकता है । सकारात्मक बनेगें तो मन में ललक पैदा होगी। किसी ने कहा है कि ‘स’ से ‘स’ तक सात सुर,सात सुरों में राग । उतना ही संगीत है,जितनी तुझमें आग । अपने आत्म विश्वास को मजबूत कर कठोर अभ्यास करें, मन स्वतः ही नियन्त्रित होने लगेगा।
कहा भी गया है-करत करत अभ्यास के जडमति होत सुजान। रसरी आवत जात है,सिल पर पडत निशान। मन उस जिन्न के समान है जिसे बस काम चाहिये ,वह फुरसत में कभी रह ही नही सकता । रात दिन उसकी गतिविधी संचालित होती रहती है । अतः मन को मस्तिष्क के साथ जोडिये ,सकारात्मक सोंच के साथ उसका रिश्ता करिये ,क्योंकि स्वस्थ्य मस्तिष्क और सकारात्मक सोंच मनुष्य की संम्पूर्ण गतिविधियों की व्यवस्था करने वाले है।
पहले स्वयं अपने मन से जुडो,फिर दूसरों के मन से अपने मन को जोडों और इस प्रक्रिया का जाल फैलादो और वह एक बार जाल में फसा की उसको आपकी मानना ही पडेगी। जब मन आपकी मानने लगेगा तो आप अमीर होगें और यदि आप मन की मानने लगे तो आप गरीबी के करीब ही रहेगें । सोचिये,समझिये और आगे बढिये। मन मन्दिर है, इसे बुतखाना मत बनाइये।
उद्धव जोशी – एफ 5/20 एलआयजी ऋषिनगर उज्जैन
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सामाजिक सेवा के गति अवरोधक http://audichyabandhu.org/samaj-sewa-speed-breakers/ Tue, 27 Sep 2016 10:07:22 +0000 http://audichyabandhu.org/?p=2063 नीति शतक में कहा गया है कि सेवा रूपी धर्म श्रेष्ठतम आभूषण है जो योगियों की बुध्दि से भी परे हैं। सामाजिक संगठन में सेवा और समर्पण के भावों का सर्वोच्च स्थान होता है। सामाजिक संगठन कई व्यक्तियों के समूह से अस्तित्व में आता है। सामाजिक संगठन के उद्देश्यों तथा लक्ष्यों का बुध्दिमत्तापूर्ण नियोजन एवं विश्वसनीय क्रियान्वयन आवश्यक है।
श्री श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार जिस प्रकार पुष्प की अपनी सुगन्ध वायु के माध्यम से फैलती है, उसी प्रकार शांत एवं कर्मशील व्यक्ति अपने कार्य और गुणों से समाज में जाना पहचाना जाता है!
वर्तमान समय में सामाजिक सेवा के बीच कई अवरोध जन्म ले चुके है जिनके कारण निस्वार्थ सेवा ,स्वार्थ सेवा में तब्दील होती जा रही है । सामाजिक सेवा में  ऐसे गति अवरोधक दिखाई दे रहे हैं जो समाज की प्रगति को रोक रहे है । आईए ऐसे गति अवरोधकों से रूबरू होकर उनसे पैदा होने वाली समस्याओं का समाधान करें।
  1. आलोचना रूपी गति अवरोध- सामाजिक सेवा में अस्वस्थ आलोचना के सुरों का सामना करना ही पडता है! कदम कदम पर आलोचना का शिकार होना पडता है। ऐसी स्थिति में आत्मविश्वास की कमी वाले व्यक्ति  आलोचना के गतिअवरोधक की चोंट से पीडित होकर मैदान छोड कर भाग जाते हैं! इसके लिए सबसे पहले हमें ‘‘ निंदक नियरे राखिए ‘‘की पंक्ति को आत्मसात कर आलोचना सुनने की क्षमता पैदा करना होगी ! उसके बाद आलोचक को समालोचक की श्रेणी में लाने का प्रयास करना होगा ताकि समाज स्वयं देखे और आलोचक को उसका जवाब दे सके तभी आलोचना का यह अवरोध ध्वस्त हो सकेगा !
  2. अहंकार रूपी गति अवरोधक- यह अवरोधक अधिक उंचाई वाला होकर  खतरनाक श्रेणी का होता है ! सेवाभाव रखने वाले व्यक्ति के अन्दर यदि अहंकार ने अपना घोंसला बना लिया तो समझों उसका अवमूल्यन शुरू हो कर उसकी सेवा भावना को तहस नहस कर डालता है। सच्ची सामाजिक सेवा के लिए अहंकार के अवरोधक को समूल उखाडना ही पडेगा।
  3. रिश्तेदारी रूप अवरोधक – सेवा से समाज का हर व्यक्ति जुडा रहना चाहता है किन्तु किन्ही विषयों पर स्पष्ट राय जाहिर करना हो तो रिश्तेदारी अवरोधक बन कर सामने आ जाती है। मन में बहुत सी बाते कहने के लिए होती है, किन्तु रिश्तेदारी है कौन बुरा बने ! बस यही से समाज का बिखराव प्रारम्भ हो जाता है ! इसके लिए सत्य कहने की हिम्मत जुटाना होगी तभी असत्य पराजित हो सकेगा ! अन्यथा रिश्तेदारी निभाते रहो और मन ही मन घुटते रहो ।
  4. उथले एवं अपरिपक्व विचारों का अवरोध – समाज रूपी सागर में दो प्रकार की विचार धारा प्रवाहित होती है ! पहली मौलिक एवं गंभीर विचारों की धारा और दूसरी  उथले एवं अपरिपक्व विचारों की धारा ! गंभीर और मौलिक विचारधारा के व्यक्ति सबको साथ लेकर समाजोन्नति पर विचार विमर्श कर वातावरण को सुरभित बनाते है किन्तु  अपरिपक्व और उथले विचार वाला व्यक्ति अपने स्वार्थ तक सीमित रहता है! हर बार एक ही बात परोसता है कि हमें समाज से क्या लेना,समाज ने हमारे लिए क्या किया ! ऐसे विचारों की लक्ष्मण रेखा को वह कभी पार कर ही नही सकता है! ऐसे विचार प्रगति में रूकावट पैदा करते हैं ! ऐसे अनुपयोगी खर पतवारों को नष्ट करने के लिए  गंभीर विचारों की दवाई का छिडकाव आवश्यक है ।
  5. नाम की महिमा ,मंच की गरिमा और स्व प्रशंसा का अवरोध- आज के समय में कई व्यक्ति अपना नहीं किन्तु अपने नाम का अस्तित्व बनाये रखना चाहते है ! येन केन प्रकारेण वे सामाजिक मंचो पर आने,अपना स्वागत कराने,समाचार पत्रों,सामाजिक पत्रिकाओं  में फोटू और नाम का गुणगान करवाने का प्रतिपल प्रयास करते रहते है! मंच पर बैठने की ललक और माईक पर वाणी विलास से बखान किन्तु व्यावहारिक धरातल पर विलुप्त प्रजाति के बन जाना, अपनी प्रशंसा के कसीदे कडवाना जैसे कई प्रयास करते है।इसके कारण समाज में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होने लगती है । हालाकि ऐसे लोग अधिक समय तक प्रभावी नहीं रहते हैं किन्तु जब तक भी वे समाज में सक्रिय रहते है समाज की प्रगति को अवरूध्द करते रहते हैं ! इसके विपरीत जो व्यक्ति नाम के बजाय श्रध्दा और समर्पण के भावों के साथ समाज की सेवा में तल्लीन रहता है समाज भी उसके काम की पूजा करता है और अच्छे भावों से उसे देखता है! ऐसी स्थिति में नाम,मंच और प्रशंसा की चाटुकारिता  के अवरोधो को भी दूर करना होगा।
उक्त उल्लेखित अवरोधों के अतिरिक्त भी ऐसे कई अज्ञात अवरोधक समाज में सक्रिय हैं जिनके कारण समाज में मतभेद गहरा रहा है! सामने प्रशंसा और पीठ फेरते ही बुराई ! ऐसा कष्टदायक अवरोधक है जो अद्रश्य होकर नुकसान पहुंचा रहा है । यदि हम समाज की प्रगति के लिए ऐसे अवरोधकों को समाप्त करने का नहीं सोंच पाये तो हमे रसातल में जाने से कोई नहीं रोक सकता ! अतः समाज की एकता अखंडता के लिए ऐसे अवरोधकों को का समूल नष्ट करने के लिए  सक्रिय होना ही पडेगा।
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18 वी सदी के औदीच्य साहित्यकार – ‘‘श्री लल्लूलाल जी‘‘   http://audichyabandhu.org/shri-lallulalji/ Tue, 27 Sep 2016 09:53:04 +0000 http://audichyabandhu.org/?p=2058 – प्रकाश दुबे (41 विद्यानगर उज्जैन)
पन्द्रहवी, सोलहवी सदी में गुजरात से विभिन्न समूहों में पलायित सहस्त्र औदीच्य, उत्तर, उत्तर पश्चिम दिशा में राजस्थान,मालवा के साथ पंजाब,उत्तर प्रदेश के शहर मथुरा,आगरा, अलीगढ ,फर्रूखाबाद,बनारस आदि शहरों में जाकर बस गये । ऐसा ही एक पंडित परिवार पुरोहित चैनसुख का आगरा में पूर्वजों के समय से ही निवासित था। आज से 250 वर्ष पूर्व  सन 1763 में यहीं लल्लूरामजी का जन्म हुआ।उन्हे अपने पारंपरिक पुरोहित व्यवसाय में रूचि नहीं थी । पाण्डित्य विव्दत्ता से युक्त उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व साहित्यिक गतिविधियों की और विशेष प्रवृत्त था ।
अपनी रूचि के अनुसार सम्मानित आजिविका के लिए लल्लूलाल जी मुर्शिदाबाद, कलकत्ता, जगन्नाथपुरी आदि स्थानों पर भटकते रहे और सभी जगह सन्त महात्मा, राजपुरूषों के सम्पर्क में आये और उन्हे उचित सम्मान भी मिला। मुर्शिदाबाद में गोस्वामी गोपालदास के सत्संग में रहे।उन्हे वहां के नवाब मुबारकउद्दौला ने आजीविका हेतु प्रस्ताव दिया लेकिन लल्लूलाल जी ,गोस्वामीजी का देहान्त हो जाने से कलकत्ता चले गये।  जहां राजा रामकृष्ण के आश्रम में रहे। यहां जब आजीविका  की जुगाड नहीं जमी तो जगन्नाथपुरी चले आये। यहां नागपुर के राजा से भेंट हुई । लल्लूलाल जी की प्रतिभा से परिचित होकर उन्होने उन्हे नागपुर चलने का प्रस्ताव दिया किन्तु वे पुनःकलकत्ता लौट आये।  कलकत्ता में एक घटना से लल्लूलाल जी के जीवन को नई दिशा मिली तथा उन्हे   उनकी रूचि के अनुकूल दायित्व मिला। आपने गंगा तट पर डूबते हुए एक अंग्रेज को बचाया जिसने प्रसन्न होकरउनके लिए एक प्रेस खुलवा दिया। उनका परिचय यहां पादरी बुरन, रसेल वे डाॅ.गिलक्रिस्ट से हुआ। जिनके सहयोग से उन्हे फोर्ट विलियम कालेज में हिन्दी गद्य ग्रन्थों की रचना करने का कार्य मिला।
लल्लूलाल जी की कोई लिखित मौलिक रचना तो उपलब्ध नहीं है किन्तु उन्होने अनेक संस्कृत व ब्रज भाषा के ग्रन्थों का खडी बोली हिन्दी में अनुवाद किया जो ग्रन्थ लल्लूलाल प्रेस में ही मुद्रित व प्रकाशित हुए। उन्होने सुन्दरदास के ब्रज भाषा में  लिखित सिंहांसन बत्तीसी शिवदास  कवि की संस्कृत में लिखित बेताल पंचविशतिका माधोराम कवि के माधोनल ब्रज भाषा में शकुन्तला नाटक,प्रेम सागर आदि ब्रजभाषा से खडी बोली में लिखा जिसके मूल रचनाकार  चतुर्भुज दास थे । अन्य पुस्तके जो उनके लल्लूलाल प्रेस से मुद्रित प्रकाशित हुई उनमें प्रमुख सभा विलास सन् 1813 में माधव विलास 1817 में ,लतायफे हिन्दी 1810 में, लालचिन्द्रका 1818 में व ब्रजभाषा व्याकरण 1811 में !इस प्रकार  उनका शेष समस्त जीवन हिन्दी साहित्य की सेवा में व्यतीत हुआ । सन् 1835 में कलकत्ता में ही उनका देहावसान हुआ। उनकी मृत्यु के उपरान्त भी उनके व्दारा स्थापित लल्लूलाल प्रेस आगे भी हिन्दी की सेवा करते हुए संचालित होता रहा।
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सास सुशील और बहु बदनाम क्यों ? http://audichyabandhu.org/saas-bahu/ Mon, 26 Sep 2016 12:43:05 +0000 http://audichyabandhu.org/?p=2046 सास और बहू की जन्म कुण्डली मिलान करने की जनचर्चा होती है किन्तु आज तक कभी दोनों की कुण्डली को किसी ने मिलाया नहीं ? क्योंकि सास बहु संवाद तो बेटे की शादी के बाद ही प्रारम्भ होता है । पहले तो बहु सर्वगुण सम्पन्न नजर आती है।
शादी के बाद सास के प्रति बहू की वाणी  सुनने को मिलती है कि मेरी सासू की जीभ में कडवापन है,कर्कश स्वभाव की है । अडोस पडोस में मेरी निन्दा करती है। यह सत्य है कि  ऐसा एक भी घर नही होगा जिस घर में सास ने बहु पर विभिन्न प्रकार के नियन्त्रण न लादें हो और ऐसे ही नियन्त्रणों ने सासु और बहु के संबंधों के  बीच दरार पैदा की है। और इन्ही कारणों से यदि सासू के प्रति बहू का मन बिगडा हुआ है तो क्या कभी घर में लक्ष्मी का वास,सरस्वती का निवास और सुख शान्ति का आभास हो सकता है । कभी नहीं ? वैसे तो सौ प्रतिशत बहू को ही दोषी ठहराया जाता है किन्तु यह कभी नहीं जानने की कोशिश नहीं हुई की बहू के कोमल तथा वात्सल्यता से भरे मन में कठोरता,कर्कशता और क्रूरता के भाव क्यों उत्पन्न हुए ? निश्चित रूप से बहू के मन को दुःखी करने में सास का स्वभाव निमित्त बन सकता है जिसके कारण बहू की बुध्दि पर आवेश ने कब्जा जमा लिया और यही बिन्दु बहू के लिये घातक और परिवार के लिये अशान्ति का घर बन जाता है। इसलिए यहाँ से बहू को ‘‘जैसी चुनौती वैसी तैयारी’’ रखना चाहिए याने यदि सास जालिम है तो बहू में क्षमा का भाव हो, सास में व्देष भरा हो तो बहू में प्रेम का भरपूर भाव होना चाहिए और यही है जैसे के साथ तैसे का सही अर्थ ।
सरल उदाहरण है यदि हमारे घर में आग लगी हो तो हम आग बुझाने के लिये पानी लायेगें ,आग को बढने तो नही देगे ।  यहाँ बहू प्रश्न कर सकती है कि एक कन्या अपने मन में अनेक अरमान लेकर किसी के घर में बहू बन कर प्रवेश करती है तब उस बहू के साथ वस्तु जैसा व्यवहार न करते हुए प्रेम और स्नेह भरा व्यवहार करने की जवाबदारी किस की है ? हाँ यह जवाबदारी ससुराल परिवार की है किन्तु यदि ऐसा नहीं हुआ तो क्या अपने जीवन को नन्दनवन बनाने के बजाय शमशानतुल्य बनाना ठीक होगा ? इसलिये अपने जीवन को सुख और सौंदर्य का पुट देने  के लिये प्रेम के केन्द्र से खुद को हटाकर कुटुम्ब को रख दो । बहू यदि अपने प्रेम को फैलाती जायेगी तो एक दिन सुख उसके चरणों का दास बन जायेगा।  कागज पर प्रेम शब्द लिखना आसान है ,जीभ से बोलना आसान है ,आँखो से पढना आसान है किन्तु जीवन में उतारना बहुत मुश्किल है। नहीं, यह आसान है , जिस प्रकार शिखर की ध्वजा बदलने से तलहटी के दुःख कम नहीं होते उसी प्रकार बाह्य रूप में  दिखावा करने के बजाय अन्तकरण से प्रेम प्रस्फुटित करना होगा तभी जीवन में प्रसन्नता की प्रतिष्ठा होगी । पश्चिम की खिडकी से नकारात्मक सुख का सूर्यास्त देखने के बजाय पूर्व की खिडकी से सकारात्मक सूर्य का उदय देखने में ही जीवन की सार्थकता है।
यदि अपने आप को बदलना आसान नहीं है तो फिर आसपास वालों को बदलना तो और भी कठिन होगा । यह समझना भी सामयिक होगा की छोटे से समाधान में बडी लडाई को समाप्त करने की ताकत है तो छोटी सी गलतफहमी  में बडी लडाई पैदा करने की पाशवी ताकत भी है। पृथ्वी में सहनशीलता का गुण है उसी प्रकार स्त्री भी पृथ्वी के समान सहनशीलता की मूर्ति है । बिगडे हुए संबंधो में यदि मिठास पैदा करनी हो तो उसकी पहल हमें ही करना पडती है । सामने वाले से ऐसे भाव की आशा रखना व्यर्थ है। प्रेम तो आग जैसा है । आग जिस प्रकार अपना रास्ता स्वयं ही बना लेती है उसी प्रकार प्रेम अपना कर्तव्य स्वयं निभा लेता है ,सामने वाले का रास्ता नहीं देखता । एक उदाहरण से हम समझें जैसे लाल लाइट को देखकर हम स्वयं को आगे बढने से रूकने के लिये हमारा मन सहजता से तैयार हो जाता है बस उसी प्रकार बडो के नियंत्रणों के आगे हमे सहज रूप से रूकने के लिये तैयार होना चाहिए । प्रेम से ,समाधान से,स्नेह से घर को हरा भरा बनाये रखने के लिये ढेर सारे अवसर है । यदि इनके स्थान पर व्देष,क्रोध और संघर्ष का रास्ता अपनाओगे तो घर शमशान बन जायेगा । इसीलिये कुटुंब के सभी सदस्यों के लिये यदि बहू की आत्मीयता गन्ने जैसी न रहकर गुड जैसी बनना चाहिए क्योंकि गन्ने में गाँठ होती है वहां रस नही रहता जबकि गुड चारो तरफ से मिठास वाला होता है।  यदि परिवार में विवेक और सहिष्णुता के गुण उभर जाये तो सारा कुटुंब प्रसन्नता का अनुभव करेगें । संयुक्त कुटुम्ब में अवरोध प्रतिरोध अवश्य आते हैं किन्तु सुरक्षा भी भरपुर मिलती है और स्वतन्त्र जीवन में सुविधाऐं जरूर हैं किन्तु सुरक्षा नहीं । इस बात को सदैव दिल दिमाग में रखना चाहिए ।
जहां परिवार से अलग रहने का विचार मन में पैदा हो तो ध्यान रखना होगा कि   दो अवसरों पर फौलादी सीना रखने वाले भी अश्रुप्रवाह को नहीं रोक पाते हैं एक अवसर है पुत्री की बिदाई का और दूसरा पुत्र की बेवफाई का । जिनके साथ हमारा संबंध ठीक नहीं है उन्ही के साथ हमें अपनी प्रेम शक्ति प्रगट करना होगी । एक हृदय संवेदनशील हो और दूसरा संवेदनहीन हो तो भी संबंध बनाये रखने में बाधा नहीं आती है। यदि हमें लोकप्रिय बनना है तो सबसे पहले परिवारप्रिय बनना होगा ।  युवावस्था अपने में परिवर्तन करने में जितनी सक्षम है उतनी सक्षम वृध्दावस्था नहीं । प्रेम की भाषा सबके दिल को जीतती है जबकि अधिकार की भाषा सबके दिल से अपने स्थान को खा देेती है। युवा बहु स्वयं को बदलकर,बुढी सास जो स्वयं अपने में परिवर्तन लाने में अक्षम ऐसी सास को भी बदल सकती है। तो आइए सास और बहू की सभी पुरानी किवंदन्तियों को दर किनार कर सास के स्वभाव को बदलने का कमाल दिखायें । कष्ट होगा,अहं को ठेस लगेगी किन्तु इन सबके बाद आपको जीवन जीने का एक अलग की आनन्द भी मिलेगा।
– उद्धव जोशी, उज्जैन
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परिचय से परिणय तक .गागर में सागर का समायोजन http://audichyabandhu.org/parichay-se-parinay-tak/ Wed, 21 Sep 2016 14:24:59 +0000 http://audichyabandhu.org/?p=2032 विचार वैश्विक संपत्ति हैए जो उन्हे ग्राह्य करता हैए उसके व्दारा ही वे अभिव्यक्त होते हैं ! संस्कारों के विषय में भी आदिकाल से  निरन्तर विचार मंथन चलता आया है! संस्कारों के पीछे हमारे ऋषि मुनियों का उद्देश्य था एक प्रतिभा संपन्नएविवेकशील और श्रध्दालु मानव का निर्माण करनाए किन्तु पश्चिम के प्रभाव ने भारतीय समाज को इतना अधिक प्रभावित कर दिया है कि 16 संस्कारों में से अधिकांश संस्कारों का सार सिमटकर पुस्तकों में समा गया है। आज के समय में  विवाह संस्कार जैसे कुछ संस्कार ही प्रचलन में हंै किन्तु उनमें भी लोकाचार की प्रधानता समाहित होगई  है ।

अपने बेटे बेटियों के लिए योग्य जीवन साथी का चयन सावधानी से करने की परम्परा प्राचीन समय से ही चली आ रही है। वर के चयन हेतु शास्त्रों में वर के कुलए शीलएशरीरएआयु एविद्याएवित्त व साधन सम्पन्नता इन सात बातों की जानकारी तथा पूर्ण संन्तुष्टी के बाद ही कन्या का संबंध तय करना चाहिए ! इसी प्रकार वर के मापदण्डों  के समान वधु के चयन के लिए भारव्दाज गृहयसूत्र  के अनुसार वित्तएरूपएप्रज्ञाएऔर कुल ये चार लक्षण प्रधान बताये गये हैं ! शारीरिक लक्षणों के साथ बौध्दिक सौंदर्य को भी महत्व दिया गया है ।  जीवन साथी के चयन के बाद सगाई की रस्म की जाती है जिसे सगाईएटीकाएतिलकएया फलदान आदि कहा जाता है ! यह लडके और लडकी वालों के बीच अनुबंध करने की एक प्रक्रिया है!
वर्तमान समय में स्वच्छद जीवनएमानवीय मूल्यों का ल्हासएविलासिताएउच्च शिक्षाएसमाज का विस्तार एसमाज से दूरी एरिश्तों का ऋणात्मक होने जैसे अनेक कारणों की वजह से अभिभावकों को अपने बेटे बेटियों के लिए जीवन साथी चुनना गहन चिन्ता का कारण बनता जा रहा है। इन्ही सब कठिनाईयों को देखते हुए समाज सेवियों ने इस समस्या का सरल हल निकाला है जिसका नाम दिया ष्ष् परिचय सम्मेलनष्ष् जिसके  व्दारा अपने अपने समाज के अविवाहित युवक युवतियों का आपस में परिचय करा कर  उनके व्दारा योग्य जीवन साथी का चयन करने में मदद करना । परिचय सम्मेलनों से  अभिभावकों की चिन्ता कम तो हुई और ऐसे आयोजनों को सफलता भी मिल रही है किन्तु प्रत्याशी जिनके लिए यह व्यवस्था की गई एकम संख्या में उपस्थित होते है।
भगवान महाकाल की नगरी में पिछले 17 वर्षो से परिचय सम्मेलन का सफलतम आयोजन किया जा रहा है जिसका लाभ देश विदेश में निवास कर रहे कई परिवारों को मिला और आज कई परिवार उज्जैन के परिचय सम्मेलन से उन्हे मिली सफलता का परिचय अन्य परिवारों को दे रहे हैं!
युवा मंच व्दारा आयोजित 18 दिसम्बर 2016 को 18 वे अविवाहित युवा युवति परिचय सम्मेलन का मंच उन्ही युवा युवतियों के लिए उपलब्ध रहेगा जो जीवन साथी के चयन हेतु अपने अपने अनमोल विचारों के माध्यम से सभी को अवगत करावेगें ! इससे यह फायदा होगा कि युवा और युवतियां जो वहां उपस्थित रहेगें एअपने समान विचारधारा वाले जीवन साथी का चयन करने में अपना मन बना सकेगें एएक दूसरे को भली प्रकार जान सकेगें और अभिभावकों की उपस्थिति मे जीवन साथी चयन की अभिस्वीकृति भी प्राप्त कर सकेगें !
विशेषकर उन सभी युवा युवतियों से जो जीवन साथी चयन की देहलीज पर खडे है एइस आयोजन में उपस्थित होकर अपने सपनों को पूरा करें तथा अपने अभिभावकों की चिन्ता को दूर करें !
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