सम्पादकीय

नो उल्लू बनाविंग

बडे जोर शोर से धूम मचा रहा है एक स्लोगन ‘‘ नो उल्लू बनाविंग‘‘, क्यों कि हम सब एक दूसरे को कहीं न कहीं उल्लू बनने/बनाने में लगे है । ऋग्वेद में विवाह को यज्ञ माना जाकर उसका प्रधान कार्य संतानोत्पति माना गया है । पुरूष  को बीज और नारी …

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कन्या और कार/हाथी बंधा व्दार

पुत्री परिवार की पावनता,कन्या कलियों की मुस्कान,और बेटी बचपन का संस्कार जैसे अलंकरणों से युक्त है । बेटी माँ की गोद से लेकर गोदावरी के किनारों तक अठखेलियाँ करते हुवे पुष्पित,पल्लवित हा,े कन्या का रूप ग्रहण कर लेती है । इसी बेटी पुत्री, कन्या को कवियों,साहित्यकारों,कथाकारों, सन्तो, महन्तों ने मासूम …

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 मन को कैसे मनावें

आम धारणा है कि मन मानता ही नहीं है? मन इतना बेलगाम क्यों है? मन को कैसे मनायें? मन को वश में करने के लिये हजारो किताबी नुस्खे बाजार मे उपलब्ध है । अध्यात्म,योग,मनोविज्ञान, शास्त्र आदि के विव्दानों एवं विशेषज्ञों ने भी मन को मनाने के कईं सरल उपाय खोजे हैं …

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सामाजिक सेवा के गति अवरोधक

नीति शतक में कहा गया है कि सेवा रूपी धर्म श्रेष्ठतम आभूषण है जो योगियों की बुध्दि से भी परे हैं। सामाजिक संगठन में सेवा और समर्पण के भावों का सर्वोच्च स्थान होता है। सामाजिक संगठन कई व्यक्तियों के समूह से अस्तित्व में आता है। सामाजिक संगठन के उद्देश्यों तथा …

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18 वी सदी के औदीच्य साहित्यकार – ‘‘श्री लल्लूलाल जी‘‘  

– प्रकाश दुबे (41 विद्यानगर उज्जैन) पन्द्रहवी, सोलहवी सदी में गुजरात से विभिन्न समूहों में पलायित सहस्त्र औदीच्य, उत्तर, उत्तर पश्चिम दिशा में राजस्थान,मालवा के साथ पंजाब,उत्तर प्रदेश के शहर मथुरा,आगरा, अलीगढ ,फर्रूखाबाद,बनारस आदि शहरों में जाकर बस गये । ऐसा ही एक पंडित परिवार पुरोहित चैनसुख का आगरा में …

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