मन को कैसे मनावें

आम धारणा है कि मन मानता ही नहीं है? मन इतना बेलगाम क्यों है? मन को कैसे मनायें? मन को वश में करने के लिये हजारो किताबी नुस्खे बाजार मे उपलब्ध है । अध्यात्म,योग,मनोविज्ञान, शास्त्र आदि के विव्दानों एवं विशेषज्ञों ने भी मन को मनाने के कईं सरल उपाय खोजे हैं किन्तु मन तो मन है । इस 5-6फुट के शरीर में मन, बुध्दि, दिल, दिमाग जैसे कई महत्वपूर्ण अंग हैं किन्तु सबसे ज्यादा मन ही चर्चा में रहता है । बच्चों से कहा जाता है कि मन लगाकर पढा करों। अपनों से मन मैला न करों । गोपनीय इतना की किसी के मन में क्या चल रहा है,पता ही नही ,कब किस पर मन आ जाये? आदि आदि । मन के बारे में बहुत शोधपूर्ण लिखा भी गया है।
कहा जाता है कि मन को वश में रखो,टेन्शन मत पालो,सकारात्मक सोचों। इसके प्रतिउत्तर में लोगों का कहना है कि ऐसा करना असंभव है। वर्तमान समय में हर पल तनाव दे रहा है । यहाँ हमें इतनी बात समझना होगी की मन की मनमानी ,नकारात्मक सोचने की क्रिया और टेन्शन पालने की प्रक्रिया जैसी कमजोर कडी ने तो मनुष्य को मजबुती से बांध रखा है । इस कमजोर कडी को मजबूत कडी में अन्तरित करना भी हमारे बस में है तो क्यों न सकारात्मक सोंच का श्रीेगणेश करें । इस मंहगाई के युग में सकारात्मक जीवनी शक्ति यदि हमें निशुल्क मिल रही है तो क्यों न उसका उपयोग करें।
मन के बारे में भी गहराई तक जाने की कोई आवश्यकता नहीं है । मन की दो धारायें हैं। वह या तो वश में रहेगा या भटकेगा । यदि भटकेगा तो आवारा बादल की तरह निरर्थक और अनुपयोगी होकर घूमता रहेगा। यदि मन वश में रहा तो कमाल के काम दिखा सकता है । सकारात्मक बनेगें तो मन में ललक पैदा होगी। किसी ने कहा है कि ‘स’ से ‘स’ तक सात सुर,सात सुरों में राग । उतना ही संगीत है,जितनी तुझमें आग । अपने आत्म विश्वास को मजबूत कर कठोर अभ्यास करें, मन स्वतः ही नियन्त्रित होने लगेगा।
कहा भी गया है-करत करत अभ्यास के जडमति होत सुजान। रसरी आवत जात है,सिल पर पडत निशान। मन उस जिन्न के समान है जिसे बस काम चाहिये ,वह फुरसत में कभी रह ही नही सकता । रात दिन उसकी गतिविधी संचालित होती रहती है । अतः मन को मस्तिष्क के साथ जोडिये ,सकारात्मक सोंच के साथ उसका रिश्ता करिये ,क्योंकि स्वस्थ्य मस्तिष्क और सकारात्मक सोंच मनुष्य की संम्पूर्ण गतिविधियों की व्यवस्था करने वाले है।
पहले स्वयं अपने मन से जुडो,फिर दूसरों के मन से अपने मन को जोडों और इस प्रक्रिया का जाल फैलादो और वह एक बार जाल में फसा की उसको आपकी मानना ही पडेगी। जब मन आपकी मानने लगेगा तो आप अमीर होगें और यदि आप मन की मानने लगे तो आप गरीबी के करीब ही रहेगें । सोचिये,समझिये और आगे बढिये। मन मन्दिर है, इसे बुतखाना मत बनाइये।
उद्धव जोशी – एफ 5/20 एलआयजी ऋषिनगर उज्जैन

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