नाम में सब कुछ रखा है ?      

बात बात में लोगों के मुह से निकलता है कि ‘‘नाम में क्या रखा है,काम से मतलब रखो। नाम की अपनी सार्थकता,उपयोगिता और प्रांसगिकता है। जब हम किसी से परिचय करते हैं तो कहते हैं-‘‘ आपका शुभ नाम ’’, आपकी तारीफ’’ , ‘‘युअर गुड नेम प्लीज‘‘। नाम को मुहावरों के साथ भी जोडा गया है -जैसे नाम कमाना,नाम चमकाना,नाम डुबोना,नाम बिकना आदि आदि।
यदि नाम का महत्व नहीं होता तो बच्चन परिवार नवजात पुत्री बेबी का नाम सुझाने का लोगों से आग्रह नहीं करते। नाम तो सडकों, मकानों, दुकानों, नगरों, प्रतिष्ठानों आदि सबके रखे जाते है जो उसी नाम से लम्बे समय तक जाने पहचाने जाते है। एक समय था,जब बेटे/बेटियों के नाम भगवान के नाम पर ही रखे जाते थे ताकि अन्तिम समय में भगवान का नाम निकले और मोक्ष प्राप्त हो जाय जैसे नारायण, कृष्णमोहन, रामचन्द्र,  हनुमान प्रसाद, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती आदि।
समय ने करवट बदली आजकल तो कई तरह के नाम का चलन है। बचपन का चिन्टु,मिन्टु,गोलू,कालू, जैसे अनेक नाम,स्कूल में भर्ती होते समय रखा जाने वाला कोई पापूलर नाम। एक बार  जो नाम लोगों की जुबान पर चढ जाता है वही नाम जीवन भर तो काम आता ही है, मृत्यु के बाद भी वही नाम जिन्दा रहता है।  नाम ही व्यक्तित्व की पहचान का परिचायक होता है।
शासन स्तर पर भी आजकल शहरों के पुराने  नाम भी बदले जा रहे हैं जैसे बम्बई का मुम्बई, पूना का पुणे,बडोदा का बडोदरा,मद्रास का चेन्नई,कलकत्ता का कोलकाता,बंगलोर का बैंगलुरू आदि। आजकल राजनितिक दल भी अपने नेताओं के नाम से सडकों पूलो,बगीचों,चैराहों का नाम करण कर उनका स्टेच्यू लगाने में पूरा जोर लगा देते है ।
संस्थानों के नाम सबसे अलगे हटकर रखे जा रहे हैं ताकि लोगों का स्वयमेव ध्यान आकर्षित हो जाय। जैसे एक ब्यूटीपार्लर का नाम रखा गया ‘‘लिपापोती ’’ पान की दुकान का नाम ‘‘ अधर श्रृंगार’’ कपडे की दूकान‘‘कटपीस’’ और बच्चा हवाई जहाज में पैदा हुआ तो ‘‘अन्तरिक्ष’’,सीमा पर हुआ तो ‘‘बार्डर’’ ये नाम पत्रिका से नही समय,स्थान और परिस्थिति के आधार पर रखे जाते है। नाम के लिये आज कल कई किताबें बाजार में उपलब्ध है । नाम बडा ही सोच समझ कर रखना चाहिये जिसे पुरानी पीढी के लोग बोल सके, नई पीढी को पसन्द हो ,साथ ही वह अर्थपूर्ण भी हो । हमारे यहाँ देवी देवताओं को अनेको नाम से आज भी स्मरण किया जाता है,जबकि इन्सान के दो तीन नाम में भी गफलत की स्थिति बन जाती है । बचपन का नाम चलन में हो तो मूल नाम पेरेन्टस को भी समय पर याद नही आता। कभी कभी तो परिवारों के उपनाम भी दो दो हो जाते हैं जैसे दुबे और दवे, त्रिवेदी और तिवारी आदि।  पुराने जमाने में रखे गये अटपटे नामों को बदलने की होड सी लगी है जिसे आप समाचार पत्रों के दिये गये विज्ञापन को देख कर अन्दाज लगा सकते हैं। हिन्दी में रखे गये नाम अंग्रेजी भाषा में सिकुड कर आधे हो गये है। जैसे महात्मा गांधी मार्ग को एम.जी रोड , महाराजा यशवन्तराव हास्पीटल को एम.वाय.हास्पीटल ,स्वामी विवेकानन्द रोड को एस.वी.रोड बोला जा रहा है। नाम की पुराण लम्बी,जिसे यहीं विराम दिया जावे तो अच्छा।
उद्धव जोशी   एफ 5/20 एलआयजी ऋषिनगर उज्जैन मो.9406860899

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