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सास सुशील और बहु बदनाम क्यों ? – AudichyaBandhu.org

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सास सुशील और बहु बदनाम क्यों ?

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सास और बहू की जन्म कुण्डली मिलान करने की जनचर्चा होती है किन्तु आज तक कभी दोनों की कुण्डली को किसी ने मिलाया नहीं ? क्योंकि सास बहु संवाद तो बेटे की शादी के बाद ही प्रारम्भ होता है । पहले तो बहु सर्वगुण सम्पन्न नजर आती है।
शादी के बाद सास के प्रति बहू की वाणी  सुनने को मिलती है कि मेरी सासू की जीभ में कडवापन है,कर्कश स्वभाव की है । अडोस पडोस में मेरी निन्दा करती है। यह सत्य है कि  ऐसा एक भी घर नही होगा जिस घर में सास ने बहु पर विभिन्न प्रकार के नियन्त्रण न लादें हो और ऐसे ही नियन्त्रणों ने सासु और बहु के संबंधों के  बीच दरार पैदा की है। और इन्ही कारणों से यदि सासू के प्रति बहू का मन बिगडा हुआ है तो क्या कभी घर में लक्ष्मी का वास,सरस्वती का निवास और सुख शान्ति का आभास हो सकता है । कभी नहीं ? वैसे तो सौ प्रतिशत बहू को ही दोषी ठहराया जाता है किन्तु यह कभी नहीं जानने की कोशिश नहीं हुई की बहू के कोमल तथा वात्सल्यता से भरे मन में कठोरता,कर्कशता और क्रूरता के भाव क्यों उत्पन्न हुए ? निश्चित रूप से बहू के मन को दुःखी करने में सास का स्वभाव निमित्त बन सकता है जिसके कारण बहू की बुध्दि पर आवेश ने कब्जा जमा लिया और यही बिन्दु बहू के लिये घातक और परिवार के लिये अशान्ति का घर बन जाता है। इसलिए यहाँ से बहू को ‘‘जैसी चुनौती वैसी तैयारी’’ रखना चाहिए याने यदि सास जालिम है तो बहू में क्षमा का भाव हो, सास में व्देष भरा हो तो बहू में प्रेम का भरपूर भाव होना चाहिए और यही है जैसे के साथ तैसे का सही अर्थ ।
सरल उदाहरण है यदि हमारे घर में आग लगी हो तो हम आग बुझाने के लिये पानी लायेगें ,आग को बढने तो नही देगे ।  यहाँ बहू प्रश्न कर सकती है कि एक कन्या अपने मन में अनेक अरमान लेकर किसी के घर में बहू बन कर प्रवेश करती है तब उस बहू के साथ वस्तु जैसा व्यवहार न करते हुए प्रेम और स्नेह भरा व्यवहार करने की जवाबदारी किस की है ? हाँ यह जवाबदारी ससुराल परिवार की है किन्तु यदि ऐसा नहीं हुआ तो क्या अपने जीवन को नन्दनवन बनाने के बजाय शमशानतुल्य बनाना ठीक होगा ? इसलिये अपने जीवन को सुख और सौंदर्य का पुट देने  के लिये प्रेम के केन्द्र से खुद को हटाकर कुटुम्ब को रख दो । बहू यदि अपने प्रेम को फैलाती जायेगी तो एक दिन सुख उसके चरणों का दास बन जायेगा।  कागज पर प्रेम शब्द लिखना आसान है ,जीभ से बोलना आसान है ,आँखो से पढना आसान है किन्तु जीवन में उतारना बहुत मुश्किल है। नहीं, यह आसान है , जिस प्रकार शिखर की ध्वजा बदलने से तलहटी के दुःख कम नहीं होते उसी प्रकार बाह्य रूप में  दिखावा करने के बजाय अन्तकरण से प्रेम प्रस्फुटित करना होगा तभी जीवन में प्रसन्नता की प्रतिष्ठा होगी । पश्चिम की खिडकी से नकारात्मक सुख का सूर्यास्त देखने के बजाय पूर्व की खिडकी से सकारात्मक सूर्य का उदय देखने में ही जीवन की सार्थकता है।
यदि अपने आप को बदलना आसान नहीं है तो फिर आसपास वालों को बदलना तो और भी कठिन होगा । यह समझना भी सामयिक होगा की छोटे से समाधान में बडी लडाई को समाप्त करने की ताकत है तो छोटी सी गलतफहमी  में बडी लडाई पैदा करने की पाशवी ताकत भी है। पृथ्वी में सहनशीलता का गुण है उसी प्रकार स्त्री भी पृथ्वी के समान सहनशीलता की मूर्ति है । बिगडे हुए संबंधो में यदि मिठास पैदा करनी हो तो उसकी पहल हमें ही करना पडती है । सामने वाले से ऐसे भाव की आशा रखना व्यर्थ है। प्रेम तो आग जैसा है । आग जिस प्रकार अपना रास्ता स्वयं ही बना लेती है उसी प्रकार प्रेम अपना कर्तव्य स्वयं निभा लेता है ,सामने वाले का रास्ता नहीं देखता । एक उदाहरण से हम समझें जैसे लाल लाइट को देखकर हम स्वयं को आगे बढने से रूकने के लिये हमारा मन सहजता से तैयार हो जाता है बस उसी प्रकार बडो के नियंत्रणों के आगे हमे सहज रूप से रूकने के लिये तैयार होना चाहिए । प्रेम से ,समाधान से,स्नेह से घर को हरा भरा बनाये रखने के लिये ढेर सारे अवसर है । यदि इनके स्थान पर व्देष,क्रोध और संघर्ष का रास्ता अपनाओगे तो घर शमशान बन जायेगा । इसीलिये कुटुंब के सभी सदस्यों के लिये यदि बहू की आत्मीयता गन्ने जैसी न रहकर गुड जैसी बनना चाहिए क्योंकि गन्ने में गाँठ होती है वहां रस नही रहता जबकि गुड चारो तरफ से मिठास वाला होता है।  यदि परिवार में विवेक और सहिष्णुता के गुण उभर जाये तो सारा कुटुंब प्रसन्नता का अनुभव करेगें । संयुक्त कुटुम्ब में अवरोध प्रतिरोध अवश्य आते हैं किन्तु सुरक्षा भी भरपुर मिलती है और स्वतन्त्र जीवन में सुविधाऐं जरूर हैं किन्तु सुरक्षा नहीं । इस बात को सदैव दिल दिमाग में रखना चाहिए ।
जहां परिवार से अलग रहने का विचार मन में पैदा हो तो ध्यान रखना होगा कि   दो अवसरों पर फौलादी सीना रखने वाले भी अश्रुप्रवाह को नहीं रोक पाते हैं एक अवसर है पुत्री की बिदाई का और दूसरा पुत्र की बेवफाई का । जिनके साथ हमारा संबंध ठीक नहीं है उन्ही के साथ हमें अपनी प्रेम शक्ति प्रगट करना होगी । एक हृदय संवेदनशील हो और दूसरा संवेदनहीन हो तो भी संबंध बनाये रखने में बाधा नहीं आती है। यदि हमें लोकप्रिय बनना है तो सबसे पहले परिवारप्रिय बनना होगा ।  युवावस्था अपने में परिवर्तन करने में जितनी सक्षम है उतनी सक्षम वृध्दावस्था नहीं । प्रेम की भाषा सबके दिल को जीतती है जबकि अधिकार की भाषा सबके दिल से अपने स्थान को खा देेती है। युवा बहु स्वयं को बदलकर,बुढी सास जो स्वयं अपने में परिवर्तन लाने में अक्षम ऐसी सास को भी बदल सकती है। तो आइए सास और बहू की सभी पुरानी किवंदन्तियों को दर किनार कर सास के स्वभाव को बदलने का कमाल दिखायें । कष्ट होगा,अहं को ठेस लगेगी किन्तु इन सबके बाद आपको जीवन जीने का एक अलग की आनन्द भी मिलेगा।
– उद्धव जोशी, उज्जैन

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