सामाजिक सेवा के गति अवरोधक

नीति शतक में कहा गया है कि सेवा रूपी धर्म श्रेष्ठतम आभूषण है जो योगियों की बुध्दि से भी परे हैं। सामाजिक संगठन में सेवा और समर्पण के भावों का सर्वोच्च स्थान होता है। सामाजिक संगठन कई व्यक्तियों के समूह से अस्तित्व में आता है। सामाजिक संगठन के उद्देश्यों तथा लक्ष्यों का बुध्दिमत्तापूर्ण नियोजन एवं विश्वसनीय क्रियान्वयन आवश्यक है।
श्री श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार जिस प्रकार पुष्प की अपनी सुगन्ध वायु के माध्यम से फैलती है, उसी प्रकार शांत एवं कर्मशील व्यक्ति अपने कार्य और गुणों से समाज में जाना पहचाना जाता है!
वर्तमान समय में सामाजिक सेवा के बीच कई अवरोध जन्म ले चुके है जिनके कारण निस्वार्थ सेवा ,स्वार्थ सेवा में तब्दील होती जा रही है । सामाजिक सेवा में  ऐसे गति अवरोधक दिखाई दे रहे हैं जो समाज की प्रगति को रोक रहे है । आईए ऐसे गति अवरोधकों से रूबरू होकर उनसे पैदा होने वाली समस्याओं का समाधान करें।
  1. आलोचना रूपी गति अवरोध- सामाजिक सेवा में अस्वस्थ आलोचना के सुरों का सामना करना ही पडता है! कदम कदम पर आलोचना का शिकार होना पडता है। ऐसी स्थिति में आत्मविश्वास की कमी वाले व्यक्ति  आलोचना के गतिअवरोधक की चोंट से पीडित होकर मैदान छोड कर भाग जाते हैं! इसके लिए सबसे पहले हमें ‘‘ निंदक नियरे राखिए ‘‘की पंक्ति को आत्मसात कर आलोचना सुनने की क्षमता पैदा करना होगी ! उसके बाद आलोचक को समालोचक की श्रेणी में लाने का प्रयास करना होगा ताकि समाज स्वयं देखे और आलोचक को उसका जवाब दे सके तभी आलोचना का यह अवरोध ध्वस्त हो सकेगा !
  2. अहंकार रूपी गति अवरोधक- यह अवरोधक अधिक उंचाई वाला होकर  खतरनाक श्रेणी का होता है ! सेवाभाव रखने वाले व्यक्ति के अन्दर यदि अहंकार ने अपना घोंसला बना लिया तो समझों उसका अवमूल्यन शुरू हो कर उसकी सेवा भावना को तहस नहस कर डालता है। सच्ची सामाजिक सेवा के लिए अहंकार के अवरोधक को समूल उखाडना ही पडेगा।
  3. रिश्तेदारी रूप अवरोधक – सेवा से समाज का हर व्यक्ति जुडा रहना चाहता है किन्तु किन्ही विषयों पर स्पष्ट राय जाहिर करना हो तो रिश्तेदारी अवरोधक बन कर सामने आ जाती है। मन में बहुत सी बाते कहने के लिए होती है, किन्तु रिश्तेदारी है कौन बुरा बने ! बस यही से समाज का बिखराव प्रारम्भ हो जाता है ! इसके लिए सत्य कहने की हिम्मत जुटाना होगी तभी असत्य पराजित हो सकेगा ! अन्यथा रिश्तेदारी निभाते रहो और मन ही मन घुटते रहो ।
  4. उथले एवं अपरिपक्व विचारों का अवरोध – समाज रूपी सागर में दो प्रकार की विचार धारा प्रवाहित होती है ! पहली मौलिक एवं गंभीर विचारों की धारा और दूसरी  उथले एवं अपरिपक्व विचारों की धारा ! गंभीर और मौलिक विचारधारा के व्यक्ति सबको साथ लेकर समाजोन्नति पर विचार विमर्श कर वातावरण को सुरभित बनाते है किन्तु  अपरिपक्व और उथले विचार वाला व्यक्ति अपने स्वार्थ तक सीमित रहता है! हर बार एक ही बात परोसता है कि हमें समाज से क्या लेना,समाज ने हमारे लिए क्या किया ! ऐसे विचारों की लक्ष्मण रेखा को वह कभी पार कर ही नही सकता है! ऐसे विचार प्रगति में रूकावट पैदा करते हैं ! ऐसे अनुपयोगी खर पतवारों को नष्ट करने के लिए  गंभीर विचारों की दवाई का छिडकाव आवश्यक है ।
  5. नाम की महिमा ,मंच की गरिमा और स्व प्रशंसा का अवरोध- आज के समय में कई व्यक्ति अपना नहीं किन्तु अपने नाम का अस्तित्व बनाये रखना चाहते है ! येन केन प्रकारेण वे सामाजिक मंचो पर आने,अपना स्वागत कराने,समाचार पत्रों,सामाजिक पत्रिकाओं  में फोटू और नाम का गुणगान करवाने का प्रतिपल प्रयास करते रहते है! मंच पर बैठने की ललक और माईक पर वाणी विलास से बखान किन्तु व्यावहारिक धरातल पर विलुप्त प्रजाति के बन जाना, अपनी प्रशंसा के कसीदे कडवाना जैसे कई प्रयास करते है।इसके कारण समाज में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होने लगती है । हालाकि ऐसे लोग अधिक समय तक प्रभावी नहीं रहते हैं किन्तु जब तक भी वे समाज में सक्रिय रहते है समाज की प्रगति को अवरूध्द करते रहते हैं ! इसके विपरीत जो व्यक्ति नाम के बजाय श्रध्दा और समर्पण के भावों के साथ समाज की सेवा में तल्लीन रहता है समाज भी उसके काम की पूजा करता है और अच्छे भावों से उसे देखता है! ऐसी स्थिति में नाम,मंच और प्रशंसा की चाटुकारिता  के अवरोधो को भी दूर करना होगा।
उक्त उल्लेखित अवरोधों के अतिरिक्त भी ऐसे कई अज्ञात अवरोधक समाज में सक्रिय हैं जिनके कारण समाज में मतभेद गहरा रहा है! सामने प्रशंसा और पीठ फेरते ही बुराई ! ऐसा कष्टदायक अवरोधक है जो अद्रश्य होकर नुकसान पहुंचा रहा है । यदि हम समाज की प्रगति के लिए ऐसे अवरोधकों को समाप्त करने का नहीं सोंच पाये तो हमे रसातल में जाने से कोई नहीं रोक सकता ! अतः समाज की एकता अखंडता के लिए ऐसे अवरोधकों को का समूल नष्ट करने के लिए  सक्रिय होना ही पडेगा।

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उद्धव जोशी – एफ 5/20 एलआयजी ऋषिनगर उज्जैन -uddhavjoshi1946@gmail.com

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