श्रीस्थल प्रकाश किंबा उदीच्य प्रकाश – औदीच्यों का इतिहास ग्रन्थ.

         श्रीस्थल प्रकाश किंवा (अथवा) उदीच्य प्रकाश जैसा की नाम से जाना जा सकता है, श्रीस्थल अर्थात सिद्धपुर में प्रकाशित होने वाले, उत्तर भारत से आए (उदीची) ब्राह्मणो का संस्कृत वर्णित इतिहास गाथा है। पौराणिक शैली में गुरु- शिष्य संबाद के रूप में दो खंडो में लिखा गया एक महत्व पूर्ण प्राचीन ग्रंथ है।

     मूल स्वरूप के इस ग्रथ के रचना कार “ ठाकुर पुरुषोत्तम शर्मा” ने ग्रंथ रचना कब की यह शोध का विषय है। इसका प्रथम गुजराती भाषांतर Untitledका प्रकाशन अहमदवाद के श्री ठाकुर प्राण गोविंद राजाराम जी ने किया था।

     श्री ठाकुर प्राणगोविंद जी की प्रेरणा से स्व. श्री शास्त्री अमृतराम करुणा शंकर ठाकर जी ने संबत 1929 (सन 1872) में इस ग्रंथ की अशुद्धियाँ सुधार कर गुजराती भाषांतर तैयार करवाकर प्रकाशित किया था। यह हिन्दी भाषांतर संबत 2058 सन 2002 में प्रकाशित इसी ग्रंथ से, जो हमको श्री अजीत भाई मरफतिया (त्रिवेदी) सिद्धपुर से प्राप्त हुआ था, पर आधारित है।

   Bramhin Samaj 4x3.5=1सहस्र औदीच्य ब्राम्हणौ से संबन्धित अन्य प्रकाशित पुस्तकों में से प्रमुख रूप से ब्राम्हण उत्पत्ति मार्तंड, औदिच्य रहस्य, गोत्र प्रवर भास्कर, औदीच्य गोत्रावली, औदीच्य रत्न माला, आदि लघु पुस्तकें इसी श्रीस्थल प्रकाश पर आधारित है।

    श्रीस्थल प्रकाश के प्रथम खंड में प्राचीन श्रीस्थल(सिद्धपुर) ओर वहाँ के पावन तीर्थ स्थानो की भव्यता का वर्णन है, द्वितीय खंड या उतरार्ध में दसवीं /ग्यारहवीं सदी, के पाटन(गुजरात) सम्राट मूलराज सोलंकी, का परिचय के साथ प्रायश्चित स्वरूप उनके द्वारा आमंत्रित उत्तर भारत क्षेत्र के तेजस्वी विद्वान शाके 1037 संवत से अधिक ब्राह्मणो के द्वारा अनुष्टान/ प्रायश्चित यज्ञ/ ओर उन्हे ग्राम दान/ ब्राह्मणो के गोत्र, अवतंक आदि आदि का वर्णन है।

    वर्तमान हिन्दी भाषी क्षेत्रों में संस्कृत या गुजराती भाषा को जानने की योग्यता न होने से हिन्दी भाषान्तर की आवश्यकता पूर्त्ति के निमित्त इसका प्रकाशन महासभा द्वारा किया जा रहा है। 244 मुद्रित प्रष्ट, छह रंगीन फोटो प्रष्ट, ओर 12 अन्य भूमिका आधी के प्रष्टों से युक्त सजिल्द रंगीन ग्लेज्ड आधुनिकतम दोहरे कवर प्रष्ट से सजी यह 7 ½ गुणा 9 ½ इंच की जिसके मध्य में राजा मूलराज का ऋषि ब्राह्मणो के स्वागत का चित्र, ओर आस-पास विंदुसरोवर, भगवान गोविंद माधव, भव्य विखंडित श्री स्थलरुद्रमहालय के काल्पनिक चित्र से सजी हें। अंतिम कवर प्रष्ट पर भग्न रुद्र महालय के चार चित्र के साथ उज्जैन की क्षिप्रा नदी तट पर सिंहस्थ परिद्रश्य है।

   यह आकर्षक ग्रंथ यह कोई कविता कहानी या उपन्यास की तरह रोचक साहित्य तो नहीं है, पर यह कुल दो सो चौसठ प्रष्ट ओर रु 150/- का यह ग्रंथ जो इसका लागत मूल्य है, हिन्दी भाषी औदीच्य बंधुओं के घर में रखा जाकर आगामी पीढ़ी को अपनी गौरव पूर्ण संस्कृति ओर इतिहास से परिचित करवाते रहने का श्रेष्ठ साधन है।

   श्रीस्थल अर्थात सिद्धपुर नाम है, उस स्थान का जहाँ से सहस्त्रोदीच्य ब्राह्मणो को पहचाना गया था, विश्व में उनकी विद्वता और ज्ञान का सम्मान किया गया था। आज एक सहस्र वर्ष में हम एक करोड़ से अधिक होकर विश्व के प्रत्येक भाग में स्थापित होकर अपने ज्ञान से उस देश को सम्पन्न बनाने में सतत अपना योगदान कर रहे हें। नई जगह नया समाज नये संघर्ष के साथ पीढ़ी-दर पीढ़ी हम खो भी देते हें,”कुछ गौरव के पल” जो हमारे अतीत गौरव के इतिहास को स्मरण रखकर इस माध्यम से ही चिरजीवी रखा जा सकता है।

 अखिल भारतीय औदीच्य महासभा मध्यप्रदेश शाखा, 41 विध्या नगर उज्जैन मप्र

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