18 वी सदी के औदीच्य साहित्यकार – ‘‘श्री लल्लूलाल जी‘‘  

– प्रकाश दुबे (41 विद्यानगर उज्जैन)
पन्द्रहवी, सोलहवी सदी में गुजरात से विभिन्न समूहों में पलायित सहस्त्र औदीच्य, उत्तर, उत्तर पश्चिम दिशा में राजस्थान,मालवा के साथ पंजाब,उत्तर प्रदेश के शहर मथुरा,आगरा, अलीगढ ,फर्रूखाबाद,बनारस आदि शहरों में जाकर बस गये । ऐसा ही एक पंडित परिवार पुरोहित चैनसुख का आगरा में पूर्वजों के समय से ही निवासित था। आज से 250 वर्ष पूर्व  सन 1763 में यहीं लल्लूरामजी का जन्म हुआ।उन्हे अपने पारंपरिक पुरोहित व्यवसाय में रूचि नहीं थी । पाण्डित्य विव्दत्ता से युक्त उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व साहित्यिक गतिविधियों की और विशेष प्रवृत्त था ।
अपनी रूचि के अनुसार सम्मानित आजिविका के लिए लल्लूलाल जी मुर्शिदाबाद, कलकत्ता, जगन्नाथपुरी आदि स्थानों पर भटकते रहे और सभी जगह सन्त महात्मा, राजपुरूषों के सम्पर्क में आये और उन्हे उचित सम्मान भी मिला। मुर्शिदाबाद में गोस्वामी गोपालदास के सत्संग में रहे।उन्हे वहां के नवाब मुबारकउद्दौला ने आजीविका हेतु प्रस्ताव दिया लेकिन लल्लूलाल जी ,गोस्वामीजी का देहान्त हो जाने से कलकत्ता चले गये।  जहां राजा रामकृष्ण के आश्रम में रहे। यहां जब आजीविका  की जुगाड नहीं जमी तो जगन्नाथपुरी चले आये। यहां नागपुर के राजा से भेंट हुई । लल्लूलाल जी की प्रतिभा से परिचित होकर उन्होने उन्हे नागपुर चलने का प्रस्ताव दिया किन्तु वे पुनःकलकत्ता लौट आये।  कलकत्ता में एक घटना से लल्लूलाल जी के जीवन को नई दिशा मिली तथा उन्हे   उनकी रूचि के अनुकूल दायित्व मिला। आपने गंगा तट पर डूबते हुए एक अंग्रेज को बचाया जिसने प्रसन्न होकरउनके लिए एक प्रेस खुलवा दिया। उनका परिचय यहां पादरी बुरन, रसेल वे डाॅ.गिलक्रिस्ट से हुआ। जिनके सहयोग से उन्हे फोर्ट विलियम कालेज में हिन्दी गद्य ग्रन्थों की रचना करने का कार्य मिला।
लल्लूलाल जी की कोई लिखित मौलिक रचना तो उपलब्ध नहीं है किन्तु उन्होने अनेक संस्कृत व ब्रज भाषा के ग्रन्थों का खडी बोली हिन्दी में अनुवाद किया जो ग्रन्थ लल्लूलाल प्रेस में ही मुद्रित व प्रकाशित हुए। उन्होने सुन्दरदास के ब्रज भाषा में  लिखित सिंहांसन बत्तीसी शिवदास  कवि की संस्कृत में लिखित बेताल पंचविशतिका माधोराम कवि के माधोनल ब्रज भाषा में शकुन्तला नाटक,प्रेम सागर आदि ब्रजभाषा से खडी बोली में लिखा जिसके मूल रचनाकार  चतुर्भुज दास थे । अन्य पुस्तके जो उनके लल्लूलाल प्रेस से मुद्रित प्रकाशित हुई उनमें प्रमुख सभा विलास सन् 1813 में माधव विलास 1817 में ,लतायफे हिन्दी 1810 में, लालचिन्द्रका 1818 में व ब्रजभाषा व्याकरण 1811 में !इस प्रकार  उनका शेष समस्त जीवन हिन्दी साहित्य की सेवा में व्यतीत हुआ । सन् 1835 में कलकत्ता में ही उनका देहावसान हुआ। उनकी मृत्यु के उपरान्त भी उनके व्दारा स्थापित लल्लूलाल प्रेस आगे भी हिन्दी की सेवा करते हुए संचालित होता रहा।

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