Monday, April 19, 2021
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सिध्दपुर ग्राम के मुखिया ‘श्री गोविन्ददरायजी’ श्री माधवरायजी’

सिध्दपुर अति प्राचीन धार्मिक, पवित्र और एतिहासिक नगरी है। यह श्री कर्दम प्रजापति श्री देवहुति माता तथा श्री कपिलमुनि का आश्रम, बिन्दुासरोवर तथा अल्पाव सरोवर की जगह में आता है। सांख्य शास्त्रक के प्रणेता श्री कपिल भगवान की मां देवहुति  का उध्दाकर इसी जगह में हुआ है । ऐसी पवित्र भूमि का उल्ले्ख्‍ श्रीमद भागवत  जी के दूसरे अध्या य में है। सिध्दउपुर उसी समय से श्री मात्रगया तीर्थ स्थामन के रूप मे पूरे जगत में प्रसिध्द है। पूरे भारतभर से मात्रगया में श्राध्द करने हेतु हिन्दून लोग यहां आते हैं। उसमें जब पित्रमास जैसे कार्तिक, चैत्र और भादवमास में तो खूब श्रध्दा के साथ माता का मोक्ष करने लोग आते हैं।

यहां मां सरस्वती भी गुप्त रूप से हाजिर है। लगभग 1978 के बाद तो सरस्वैती लुप्ते हो गई है। उसके पहले सरस्वती चार किनारों में बहती थी। लेकिन आगे बांध बंध जाने के कारण पानी नहीं पहुंचता है, फिर भी लोगों की श्रध्दा में थोडा-सा भी अन्तर नहीं आया। मां सरस्व्ती नदी के किनारे पर श्री अरडेश्वपर महादेव, श्री ब्रम्हांंडेश्‍वर महादेव, श्री वाल्केश्वगर महादेव, श्री सिध्देनाथ महादेव, श्री हाटकेश्वकर महादेव, श्री बटेश्वनर महादेव, श्री सरस्वेती माता तथा हिंगलाज माता और भव्य‍ रूद्रमहालय का अति प्राचीन मंदिर है। श्री बरडेश्वशर महादेव के मंदिर परिसर में सिध्दवपुर के संत  श्री देवशंकर बापा का भव्य आश्रम है। सिध्ददपुर देवभूमि है । यह भूमि ऋषि मुनियों तथा देवताओं की भूमि है । सभी देवताओं का मोसाण सिध्दपुर है।

इस धार्मिक और पवित्र शहर सिध्दपुर में ग्राम के मध्य‍ भाग में मंडी बाजार के चौक में श्री गोविन्दररायजी, श्री माधवरायजी भगवान का 215 वर्ष पुराना अति प्राचीन और भव्य मंदिर है। इन भगवान को लोग गामधणी के नाम से पहचानते हैं । इस मंदिर की स्था।पना ही भगवान का चमत्कानर है। श्री गोविंदराय जी और श्री माधवराय जी भगवान की दोनों मूर्तियां अलग अलग स्थामन से प्राप्त हुई है। लगभग 215 वर्ष पहले सिध्दरपुर के आसपास के किसान अनाज कपास आदि बेचने हेतु सिध्द्पुर के बाजार में आते थे। एक किसान की कपास की गाडी में एकदम वजन बढ जाता है। मां सरस्वती के पट में किसान व्दारा गाडी में तलाश करने पर श्री माधवरायजी मूर्ति कपास में से मिली, उस सफेद मारबल की बनी मूर्ति को किसान ने नदी के घाट पर उतारी। उस गांव के लोगों को पता चला तो गांव के लोगों ने मूर्ति को गांव में लाकर मंदिर बनाने की शुरूआत की तभी श्री गोविंदरायजी की मूर्ति बिन्दूम सरोवर पिछे जंगल में मिली। लोगों का यह कहना है कि कच्छव के एक किसान के खेत में यह मूर्ति गढी हुई है । भगवान ने किसान के स्वप्न में आकर कहा। कुछ खुदाई के बाद मूर्ति को बाहर निकाल कर सिध्दकपुर बिन्दु सरोवर के जंगल में रखी। गांव के लोगों को यह खबर मालूम पडने पर मूर्ति लाकर त्रिवेदी परिवार के बडे बुजुर्गो ने भगवान का मंदिर बनाकर दोनों मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करके भव्य मंदिर की स्थापना की। इसी कारण इस परिवार के कई सदस्यों वारसा पाने का हक है। इतिहासकारों ने बताया की चंद्रगुप्त और चाणक्यं के समय की ये मूर्तियां है। भगवान के आयुध शंख्‍, चक्र, गदा और पदम का उपर से अनुमान होता है।

कितने ही वर्षो से श्री गोविन्दा माधव मंदिर कमेटी पूजन और सारी व्यउवस्था  बहुत अच्छेह तरीके से कर रही थी । यह कमेटी  चेरिटी कमिश्नपर के कार्यालय में रजीथस्टछर्ड ट्रस्ट  है। यह कमेटी  श्रीजी का नीचे लिखे अनुसार उत्सगव पूजन आदि भव्यर रूप में करती है।

1. अन्न‍कूट नववर्ष कार्तिक सुदी 1
2. श्रीजी को पाटोत्सुव जन्मस दिवस माह सुदी 13
3. जन्माष्टमी श्रावण वदी 8
4. रामनवमी चैत्र सुदी 9 अन्नदकूट
5. धुलेटी/होली के दूसरे दिन फागुन बिदी 1
6. वामन जयंति भादवा सूदी 11 अन्ननकुट
7. न्रसिंह जयन्तीत वैशाख सुदी 14 अन्न कुट
8. रथयात्रा अषाढ सुदी 2

उपरोक्ति उत्सवों में रथयात्रा तथा धुलेटी में श्रीजी की शोभा यात्रा गांव में निकलती है। इन दो दिनों में भगवान सारे शहर की परिक्रमा के लिए निकलते हैं । सभी शहर वासियों को दर्शन का लाभ मिलता है ।सिध्देपुर में लगभग 65 वर्षो से श्री गोविन्दो माधव भगवान की रथयात्रा चांदी के सुशोभित कलात्मदक रथ्‍ में निकलती है। यह चांदी का रथ्‍ संवत 2000 के साल में सेठ श्री मगनलाल मूलचंद वारसो सेठ श्री गोरधनदास मगनलाल हेरू सेठ की ओर से श्री जी को भेंट किया । इस रथ में 60 किलो चांदी का उपयोग हुआ । इस रथ यात्रा में सिध्दयपुर  के औदीच्या सहस्त्रो ब्राहमण जाति के युवको छोटे छोटे बालक स्नायन कर पिताम्ब र पहन कर खूब पवित्रता से भगवान को गांवकी परिक्रमा कराते हैं। गांव के बडे बुढे श्रेष्ठबजन ,उधेागपति डाक्ट र,वकील,और भजन मंडली,महिला मंडल आदि सब जुड जाते हैं । यह रथ्‍ यात्रा श्रीजी के मन्दिर से निकल कर सरस्विती नदी के किनारे माधु पावडी पहुंचती है। वहां विद्वान ब्राहमणों व्दाररा वेदमंत्रो से श्रीजी की पादुका की विधी पूर्वक पूजन तथा आरती होती है। उसके बाद रथयात्रा स्वंय के मन्दिर में आती है। जहां आखिर में भगवान की आरती और श्रीजी की पोखवानी विधि होती है। इस रथ यात्रा का स्वावगत हर मोहल्लेी के युवको तथा श्रध्दावलुओं व्दाथरा किया जाता है। हर जगह ठण्डाक पानी, शरबत, छाछ आदि की सेवा कर भव्यह स्वारगत किया जाता है।समग्र रथ यात्रा पवित्रता पूर्वक सम्पूकर्ण होती है। सिध्दपुर तथा आस-पास के लोग श्रध्दा पूर्वक भगवान के दर्शनों का  लाभ लेते हैं। इस रथ यात्रा में श्रीनिलकंठेश्वर मन्दिर  की 2500 वर्ष  पुरानी गादी के शंकराचार्य जी भी जुडे हुए हैं। इस तरह भव्य् तरीके से रथ् यात्रा का आयोजन होता है। उसी प्रकार होली के दूसरे दिन जो धुलेटी  के नाम से जाना जाता है श्री जी की शोभा यात्रा चांदी की पालकी में निकलती है। यह शोभायात्रा पटेल लोगों की माढ में आकर सिध्दकनाथ महादेव मन्दिर जाती है।इसके बाद भगवान का जन्मी दिन माह सुदी 13 को विश्वनकर्मा जयन्तीै के दिन आता है । उस दिन भी कमेटी व्दा रा श्रीजी का षोडशेापचार  पूजन, अभिषेक, राजभोग, 101 दीपक की आरती, मंत्र जागरण्‍, स्वाध्या्य मंडल के कार्यक्रम, दत्तर मंडल के भजन और विव्दातन पंडितों का सत्संग का कार्यक्रम रखकर पूरे दिनभर भक्तभजनों  को महाप्रसाद का वितरण सुबह से शाम तक चलता रहता है। पूरे शहर तथा आसपास के भक्तीजन खूब उत्सामह से उपरोक्तर कार्यक्रम और भगवान के दर्शनों का लाभ लेते हैं।

इस प्रकार श्रीगोविन्दररायजी माधवरायजी भगवान के प्रति सिध्दपुर के हर संप्रदाय के लोगों की अपार श्रध्दा् है। जिनका सिध्दरपुर वतन है किन्तु रोजगार के लिए बाहर बसे यहां के प्रत्येकक नागरिक  की भगवान के प्रति अपार श्रध्दा है।गामधणी का हूलामणा नाम से जाने जाने वाले सिध्दिपुर के इष्ट-देवता कुदरती आफतों से ग्राम के लोगों की  तथा गांव की रक्षा करते हैं। और गांव के लोगों की श्रध्दाे के प्रमाण से श्री गोविंदरायजी माधवरायजी  की क्रपा हर भक्तक के उपर बनी रहे। ऐसा हर भक्त  का अनुभव है। श्रीजी की श्रध्दा के प्रमाण से हरएक भक्तोंर का कार्य पूर्ण होता है। सिध्दपुर के बाहर के लोगों के भी श्री गोंविन्द माधव भगवान कुलदेवता हैं। गुजरात और भारतभर के भक्तजन आपके दर्शन हेतु आते हैं। यहां बहुत से परिवारों के बच्चों की मान भी उतरती है। गये साल श्री गोंविन्द माधव भगवान की दोनों अति प्राचीन मूर्तियों का इतने सालों से होते रहे अभिषेक के कारण मूर्ति घीसती जा रही थी। उसका जीर्णोध्दार वैदिक पध्दाति से, आयुर्वेदिक लेप व्दाारा जिसमें केमिकल की एक भी वस्तु का उपयोग लिए बिना सुन्दर स्वुरूप दिया। उसके बाद पूरे मंदिर का जीर्णोध्दार और रंगरोगन  कराया गया। इस पवित्र काम में श्रीजी के भक्तों, शहर के नागरिकों, उधोगपतियों तथा श्रध्दादलु भक्तों का संपूर्ण सहयोग मिलने से यह काम रूपये 18 से 20 लाख का खर्च करके मंदिर का जीर्णोध्दाेर  ईसं 2010 में करवाया गया। मंदिर की पवित्रता के लिए तीन दिन तक श्री महाविष्णु यज्ञ का भगवान के उपर सहस्त्र कलश का जलाभिषेक का कार्यक्रम भी श्रीजी के जन्मदिवस पर करवाया। ऐसे श्री क्रष्ण बलराम के स्वरूप समान श्री गोंविदरायजी श्री माधवरायजी भगवान का दर्शन लाभ लेवे।

भालचंद भाई ऐस. ठाकुर मंत्री
श्री गोविंद माधव मंदिर कमेटी, सिध्दपुर

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